अकबर बीरबल से कैसे मिले


Akbar Birbal Stories अकबर बीरबल से कैसे मिले हिंदी कहानी
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बादशाह अकबर को शिकार का बहुत शौक था। जब वह छोटे थे तब भी पढ़ाई छोड़ कर शिकार के लिए जाया करते थे। जल्द ही वह अपने साथी दरबारियों से बेहतर घुड़सवार और शिकारी हो गए।
एक बार अकबर अपने साथियों के साथ शिकार पर गए। अकबर और उनके दो साथियों ने इतनी तेज़ घोड़े दौड़ाए कि बाकी सभी साथी पीछे रह गए। दिन ढलने लगा और अंधेरा बढ़ने लगा। अकबर और उसके साथियों को भूख और प्यास सताने लगी। उन्हें एहसास हुआ कि वे रास्ता भटक गए हैं और नहीं जानते कि घर वापस कैसे पहुंचेंगे।

अंधेरे में घुड़सवारी करते हुए वे एक ऐसी जगह पहुँचे जहाँ तीन रास्ते मिलते थे। अकबर रास्ते देख कर बहुत खुश हुए क्योंकि इनमें से किसी एक रास्ते पर चल कर वे अपनी राजधानी पहुँच सकेंगे। पर एक समस्या थी। उनमें से कोई नहीं जानता था कि कौन-सा रास्ता राजधानी आगरा को जाता है।

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तीनों शिकारी सोच रहे थे कि इस समस्या को कैसे हल किया जाए। तभी उन्हें एक रास्ते से एक लड़का आता हुआ दिखाई दिया। उस लड़के को बुलाया गया। अकबर ने कहा, "सुनो लड़के! कौन-सा रास्ता आगरा को जाता है ?"

लड़का मुस्कराया और बोला, "हुजूर, सभी जानते हैं कि रास्ता चलता नहीं है। फिर इनमें से कोई भी रास्ता आगरा या कहीं और कैसे जा सकता है?" इतना कह कर वह अपने मज़ाक पर आप ही हँस पड़ा।

यह जवाब सुनकर सब चुप हो गए। अकबर के दरबारियों में एक शब्द भी बोलने की हिम्मत नहीं थी।

लड़का फिर बोला, "सफर तो लोग करते हैं, न कि रास्ते। क्या रास्ते भी सफर करते हैं ?"

बादशाह हँस पड़े और उन्होंने कहा, "तुम ठीक कहते हो। तुम्हारा नाम क्या है ?" "महेश दास," लड़के ने जवाब दिया। फिर उसने पूछा, "हुजूर, आप कौन हैं ? और आपका नाम क्या है ?"

बादशाह ने अपनी अंगूठी उतारी और लड़के को दी। उन्होंने कहा, "तुम बादशाह अकबर से बात कर रहे हो- हिन्दुस्तान के बादशाह से। हमें तुम जैसे निडर लोगों की ज़रूरत है। जब तुम बड़े हो जाओ तो यह अंगूठी ले कर दरबार में आ जाना। हम तुम्हें तुरन्त पहचान लेंगे। अब हमें आगरा की तरफ जाने का रास्ता बताओ। हमें जल्द ही वहाँ पहुँचना है।"

महेश दास धीरे से झुका और उसने आगरा की ओर जाने वाले रास्ते की ओर इशारा किया। बादशाह उस रास्ते पर चल पड़े।

इस तरह बादशाह अकबर महेश दास से मिले। बाद में, इस महेश दास को 'बीरबल' के नाम से जाना जाने लगा।

'बीरबल' का जन्म

महेश दास जब बड़ा हुआ तो उसने अपनी सारी जमा-पूँजी और बादशाह अकबर की दी हुई राजसी मुहर वाली अंगूठी ली। माँ से विदा ली और भारत की नई राजधानी फतहपुर सीकरी की ओर चल पड़ा।

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वह राजधानी के आकार और वैभव से मन्त्रामुग्ध हो गया। वह लोगों की भीड़ के साथ साथ चलने लगा और महल की लाल दीवारों की ओर बढ़ने लगा। महल के दरवाज़े कई तरह के कीमती पत्थरों से सजे थे। उसने ऐसे दरवाज़े पहले कभी नहीं देखे थे। महेश दरवाज़े के अन्दर जाना चाहता था, परन्तु दरबान ने हवा में अपना भाला घुमाया और उसे अन्दर जाने से रोक दिया।

दरबान ने कहा, "कहाँ जा रहे हो ?" महेश ने नम्रता से कहा, "श्रीमान, मैं बादशाह से मिलने आया हूँ।"

"अच्छा! तो बादशाह तुम्हारा ही इन्तज़ार कर रहे हैं और सोच रहे हैं कि तुम कब आओगे!" दरबान ने उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहा।

यह सुनकर महेश मुस्कराया और बोला, "जी, श्रीमान! और अब मैं आ ही गया हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि तुम सीमा पर अच्छी तरह लड़ते होंगे, पर अब मुझे रोक कर अपनी जान खतरे में मत डालो।"

कुछ पल दरबान चुप रहा। फिर बहादुरी से बोला, "ऐसा क्यों कहते हो ? अगर इसी तरह बकवास करते रहे तो मैं तुम्हारा सिर काट दूंगा।"

महेश हार मानने वाला नहीं था। उसने अकबर की राजसी मुहर वाली अंगूठी दरबान को दिखाई।

हिन्दुस्तान में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं था जो अकबर की राजसी मुहर वाली अंगूठी न पहचानता हो। यह अगूंठी देख कर दरबान से कुछ भी कहते न बना। अब उसे महेश को महल के अन्दर जाने ही देना पड़ेगा चाहे उसे महेश की हिम्मत और विश्वास से चिढ़ हो रही थी। दस मिनट तक दरबान सोचता रहा। फिर उसने महेश से कहा, "तुम सिर्फ एक शर्त पर अन्दर जा सकते हो।"

महेश ने पूछा, "वह शर्त क्या है?"

दरबान ने कहा, "तुम्हें बादशाह से जो कुछ भी मिलेगा, उसका आधा तुम मुझे दोगे।" महेश ने मुस्करा कर सिर हिलाया और दरबान ने उसे अन्दर जाने दिया।

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महेश महल के अन्दर पहुँचा। उसने देखा कि एक मोहक व्यक्ति सोने के सिंहासन पर बैठा है। उसने एकदम पहचान लिया कि वह बादशाह अकबर है। सबको अपने सामने से हटा कर, महेश बादशाह के पास पहुँचा। वह बादशाह अकबर के सामने आदर से झुका और बोला, "हे पूर्ण चन्द्रमा! ईश्वर करे आपकी छाया हमेशा बढ़ती रहे!"

अकबर मुस्कराए और उन्होंने महेश से पूछा, "नौजवान, क्या चाहते हो?"

महेश सीधा खड़ा हुआ और बोला, "श्रीमान्, मैं आपके आदेश से यहाँ आया हूँ।" यह कह कर उसने वह अँगूठी बादशाह को दी, जो बादशाह ने उसे कुछ साल पहले दी थी।

"तुम एक अच्छे लड़के हो। अब तुम क्या चाहते हो ? तुम्हारे मन की इच्छा क्या है ? बताओ, मैं उसे पूरा करने की पूरी कोशिश करूँगा।"

महेश को दरबान को दिया हुआ अपना वादा याद आया। उसने बादशाह से कहा, "मुझे सौ कोड़े लगाए जाएँ।"

बादशाह अकबर हैरान हो गए। वे बोले, "मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ जब तुम ने कोई गलती ही नहीं की?"

महेश ने बड़ी नरमी से कहा, "हुजूर, अपने वादे से पीछे मत हटिए। आपने मेरे मन की इच्छा पूरी करने का वादा किया है।"

बादशाह कुछ भी समझ नहीं पाए। बड़े अनमने मन से उन्होंने महेश की पीठ पर सौ कोड़े लगाने का आदेश दिया। लोग हैरान थे कि मार खाते हुए, महेश ने उफ़ तक नहीं की।

जब पचास कोड़े लग चुके तो महेश अचानक चिल्लाया, "अब बस करो।"

अकबर ने पूछा, 'क्यों ? क्या हुआ ?"

महेश ने कहा, "हुजूर, जब मैं यहाँ आ रहा था तो आपके दरबान ने मुझे अन्दर आने से रोका। जब मैंने उस से वादा किया कि आप जो कुछ मुझे देंगे, मैं उसका आधा उसे दूँगा, तब उसने मुझे अन्दर आने दिया। मैंने अपना हिस्सा ले लिया है। अब दरबान की बारी है।"

यह सुनकर सभी ज़ोर से हँस पड़े।

दरबान को अपनी रिश्वत लेने के लिए बुलाया गया। बादशाह ने महेश से कहा, "तुम अब भी वैसे ही निडर हो जैसे बचपन में थे। तुम अब बहुत ही चतुर नौजवान हो गए हो। मैं अपने दरबार से रिश्वत लेने वालों और बेईमान लोगों को हटाना चाहता था। मैं कई कानून बना कर भी वह न कर पाता जो तुमने एक छोटे-से उपाय से कर दिखाया। अब से, अपनी बुद्धिमत्ता के कारण तुम्हें लोग 'बीरबल' कहेंगे और तुम मेरे मुख्य सलाहकार बनोगे।'

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इस तरह 'बीरबल' का जन्म हुआ।

सवाल के जवाब में सवाल

एक दिन अकबर ने बीरबल से पूछा, "बीरबल, क्या तुम बता सकते हो कि एक पत्नी अपनी कलाई में कितनी चूड़ियाँ पहनती है ?"

बीरबल ने कहा, "नहीं हुजूर, मैं नहीं बता सकता।"

अकबर ने कहा, "तुम नहीं बता सकते! तुम रोज़ अपनी पत्नी की कलाई देखते हो फिर

भी यह नहीं बता सकते कि उसकी कलाई में कितनी चूड़ियाँ हैं। यह कैसे हो सकता है ?" बीरबल ने जवाब दिया, "महाराज, चलिए बगीचे में चलते हैं। वहाँ मैं आपको बताऊँगा यह कैसे हो सकता है?"

दोनों बगीचे की ओर चले। वे एक छोटी-सी सीढ़ी से उतरे जो बगीचे की ओर जाती थी। बगीचे में पहुँचने पर बीरबल ने कहा, "महाराज, आप रोज़ इस सीढ़ी से ऊपर-नीचे जाते हैं। क्या आप बता सकते हैं इसमें कितने पद हैं ?"

अकबर को बीरबल का जवाब समझ आ गया और वे झेंप कर मुस्करा दिए।

गधा कौन?

गर्मियों के दिन थे। नहाने के लिए बादशाह अकबर नदी पर गए। उनके साथ उनके दो बेटे (पुत्र) और मन्त्री, बीरबल भी थे। नदी के किनारे, अकबर और उनके पुत्रों ने अपने कपड़े उतारे। अकबर ने बीरबल से कहा, "जब तक हम नहाते हैं, तुम इन कपड़ों को सँभालो।" बीरबल नदी के किनारे खड़ा हो गया। वह अकबर और उनके पुत्रों की नदी से बाहर आने की प्रतीक्षा करने लगा। सारे कपड़े उसके कन्धे पर थे।

बीरबल को इस तरह कपड़े उठाए देख कर, अकबर को एक मज़ाक सूझा। उन्होंने कहा, "बीरबल, तुम्हें देख कर लगता है तुम धोबी के गधे का बोझ ढो रहे हो।"

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बीरबल कहाँ चुप रहने वाला था!

उसने चतुरता से उत्तर दिया, "हुजूर, एक धोबी का गधा तो केवल एक गधे का बोझ उठाता है। मैं तो तीन गधों का बोझ उठा रहा हूँ।" अकबर बीरबल की इस बात का कोई जवाब नहीं दे पाए।

(क्या आप बता सकते हैं- गधा कौन है ?)

ऊँट की गर्दन टेढ़ी क्यों?

बीरबल की होशियारी और हाज़िरजवाबी बादशाह अकबर को हमेशा हैरान कर देती थी। जब बीरबल ने दरबार में एक साल पूरा किया, तो अकबर ने उसे कुछ उपहार देने का वादा किया। परन्तु कई दिन बीत जाने पर भी बीरबल को कोई उपहार नहीं मिला। बीरबल को बहुत निराशा हुई।

एक दिन बादशाह अकबर यमुना नदी के किनारे बीरबल के साथ चहलकदमी कर रहे थे। उन्होंने वहाँ एक ऊँट को देखा और बीरबल से पूछा, "बीरबल, बताओ- इस ऊँट की गर्दन टेढ़ी क्यों है ?"

बीरबल ने सोचा- यह अच्छा मौका है अकबर को अपना वादा याद दिलाने का। उसने कुछ पल सोचने का बहाना किया, फिर बोला, "हो सकता है कि ऊँट ने किसी से कोई वादा किया हो और उसे पूरा न किया हो। हमारे धर्मग्रन्थों में लिखा है कि जो अपना वादा तोड़ता है, उसकी गर्दन टेढ़ी हो जाती है। यही वजह हो सकती है इसकी गर्दन टेढ़ी होने की।"

बीरबल के इस जवाब से अकबर को अपना वादा याद आ गया। जैसे ही वे महल में पहुँचे, अकबर ने बीरबल को उपहारों के साथ और भी इनाम दिए।

चतुर बीरबल को बिना माँगे ही अपने उपहार मिल गए।

बीरबल की स्वर्ग यात्रा

बीरबल अपनी हाज़िरजवाबी, आत्मविश्वास और ईमानदारी की वजह से अकबर का चहेता बन गया था। परन्तु दरबारी और मन्त्री उससे जलने लगे। वे हमेशा इस कोशिश में रहते थे कि किस तरह उसका अपमान करें।

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इसी जलन की वजह से, एक दिन दरबार के नाई ने बीरबल के विरुद्ध एक योजना बनाई। बादशाह की दाढ़ी बनाते हुए उसने कहा, "हुजूर, कल रात मैंने आपके पूज्य पिता को सपने में देखा।"

बादशाह ने दिलचस्पी लेते हुए पूछा, "उन्होंने क्या कहा?"

"हुजूर, उन्होंने कहा कि यहाँ स्वर्ग में सब कुछ अच्छा है। सिर्फ एक कमी है- यहाँ कोई मज़ाकिया नहीं है जो उनका दिल बहला सके।"

अगले दो दिन बादशाह इस बात के बारे में गम्भीरता से सोचते रहे- आखिर कौन स्वर्ग जा कर उनके पिता का दिल बहला सकता है ? उन्हें एक ही व्यक्ति का नाम सूझा-वह था बीरबल। और स्वर्ग जाने का एक ही तरीका था- मौत। अकबर को बीरबल जैसे अच्छे व्यक्ति को खोने का बहुत दुःख हो रहा था। परन्तु अपने पिता के बारे में सोच कर एक निर्णय ले ही लिया।

उन्होंने बीरबल को बुलवाया और कहा, "बीरबल, तुम मुझे बहुत चाहते हो। और मैं समझता हूँ कि तुम मेरे लिए कुछ भी बलिदान देने के लिए तैयार हो जाओगे।” कुछ भी न समझते हुए, बीरबल ने कहा, "जी, हुजूर!" अकबर ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, "तो बीरबल, मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे पूज्य पिता का साथ देने के लिए स्वर्ग में जाओ।"

अब बीरबल को समझ आ गया कि यह किसी की उसे मारने की नीच योजना है। उसने नम्रता से कहा, "हुजूर, मैं ज़रूर ऐसा करूँगा। परन्तु मुझे तैयारी करने के लिए कुछ दिन चाहिएं।"

बादशाह ने कहा, "ज़रूर। तुम मेरे लिए इतना कुछ कर रहे हो, सो मैं तुम्हें तैयारी के लिए एक सप्ताह का समय देता हूँ।"

अब बीरबल चिन्ता में डूब गया। किसी ने बहुत सोच-समझ कर योजना बनाई है और उससे बचना बहुत मुश्किल होगा। वह बहुत देर तक सोचता रहा। आखिर उसे एक रास्ता सूझा। उसने अपने घर के पास एक खाई खोदी, जो उसकी कब्र का काम करेगी। खाई से उसने एक सुरंग खोदी। यह सुरंग उसके घर के अन्दर कमरे तक जाती थी। यह सब तैयारी करने के बाद वह दरबार में पहुँचा। जाते ही अकबर से बोला, “महाराज, मैं स्वर्ग जाने के लिए तैयार हूँ। परन्तु मेरी दो शर्ते हैं।"




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अकबर ने पूछा, “वो शर्ते क्या हैं ? जल्दी कहो। मैं उन्हें पूरी करने की पूरी कोशिश करूँगा ताकि तुम मेरे पिता के पास स्वर्ग में जा सको।"

बीरबल ने कहा, "महाराज, मैं चाहता हूँ कि मुझे मेरे घर के पास दफनाया जाए। दूसरे, मैं चाहता हूँ कि मुझे जीवित ही दफनाया जाए ताकि मैं जिन्दा ही स्वर्ग पहुचूँ और आपके पूज्य पिता का साथ दे सकूँ।"

बादशाह को बात ठीक लगी। उन्होंने तुरन्त इन शर्तों को मान लिया और बीरबल को दफनाने की तारीख तय कर दी।

तय किया हुआ दिन आ पहुँचा। बीरबल को ज़िन्दा ही उसके घर के पास की खाई में दफना दिया गया। दफनाने की विधि पूरी होने के बाद लोग वहाँ से चले गए। और बीरबल आहिस्ता-आहिस्ता चुपचाप सुरंग से होते हुए अपने घर के अन्दर पहुँच गया। अगले छह महीने तक वह अपने घर के अन्दर बन्द रहा। अगर वह घर से निकलता तो कोई भी उसे देख सकता था और उसकी योजना बेकार हो जाती।

सातवें महीने के पहले दिन, वह लम्बी दाढ़ी बढ़ाए और बिखरे बाल लिए बाहर निकला। वह सीधा दरबार में पहुँचा। उसे देख कर बादशाह अकबर चौंके और उन्होंने उससे पूछा, "बीरबल, कैसे हो ? तुम वापस कैसे आ गए ?"

बीरबल बोला, “महाराज, मैं स्वर्ग में आपके पूज्य पिता के साथ था। वहाँ उनके साथ मैंने बहुत अच्छा समय बिताया। वे मेरे साथ से इतना खुश थे कि उन्होंने मुझे यहाँ आने की विशेष आज्ञा दे दी।"

अकबर अपने पिता के बारे में और भी बातें जानना चाहते थे। उन्होंने पूछा, "क्या मेरे लिए कोई संदेश लाए हो?"

बीरबल ने उत्तर दिया, "जी महाराज! आपके पिता को एक नाई की कमी महसूस हो रही है क्योंकि बहुत कम नाई ही स्वर्ग जाते हैं। मेरी लम्बी दाढ़ी और बाल देख रहे हैं। ये इसी बात का प्रमाण हैं कि स्वर्ग में नाइयों की कमी है। आपके पिता ने संदेश भेजा है कि आप अपना नाई तुरन्त उनके पास भेजें।"

अकबर को एकदम पूरी बात समझ आ गई। उन्होंने नाई को बुलवाया और उसे जेल की सज़ा दी। उन्होंने बीरबल को उसकी तेज़ सोच के लिए बहुत-सा इनाम दिया।

बीरबल ने चोर पकड़ा

एक अमीर व्यापारी महल के पास रहता था। एक बार उसके घर में चोरी हो गई। उसकी पत्नी के गहने चोरी हो गए। व्यापारी को शक था कि चोर उसके नौकरों में से कोई है। वह बीरबल के पास गया। उसे अपने घर में हुई चोरी और अपने शक के बारे में बताया।


बीरबल व्यापारी के घर गया। उसने सब नौकरों को इकट्ठा किया और ज़ोर से पूछा, “घर से गहने किसने चुराए हैं ?" सभी नौकरों ने सिर हिला कर चोरी से इन्कार किया।

एक पल के लिए बीरबल ने कुछ सोचा। फिर सभी नौकरों को एक जितनी लम्बाई की एक-एक लकड़ी दी और ज़ोर से कहा, "असली चोर की लकड़ी कल सुबह तक अपने-आप दो इंच बढ़ जाएगी। कल सुबह तुम सब अपनी-अपनी लकड़ी ले कर यहाँ आना।"

सभी नौकर अपने-अपने घर चले गए। दूसरे दिन वे सब फिर वहाँ इकट्ठे हो गए। बीरबल ने सब को अपनी-अपनी लकड़ी दिखाने को कहा। एक नौकर की लकड़ी दो इंच छोटी थी। बीरबल ने ज़ोर से कहा, "यही चोर है।" जेल के दरबान उस नौकर को पकड़ कर ले गए।

व्यापारी ने बीरबल से पूछा, "आपने उसे कैसे पकड़ा?" बीरबल ने उत्तर दिया, “यहाँ आने से पहले असली चोर ने अपनी लकड़ी को दो इंच काट लिया था। उसे डर था कि उसकी लकड़ी सुबह तक दो इंच बढ़ गई होगी।"









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