यौगिक शुद्धि-क्रियांएँ-षटकर्म Yogic Shatakrma जानिए :-

 योगासन, प्राणायामऔर ध्यान के अभ्यास का आरम्भ करने से पहले शरीर को विषमुक्त और शुद्ध कर लेना बहुत जरूरी है। विभिन्न कारणों से शरीर में विष-संचय होता रहता है । यदि इस विषों को शरीर से बाहर नहीं निकाला जाय तो योगासनों और प्राणायाम से आपेक्षित लाभ नहीं मिलते।


योगशास्त्र में 6 प्रकार की शुद्धि-क्रियाएं बताई गयी है : नेती, धौती, नौली, बस्ती, त्राटक और कपालभाती


यौगिक शुद्धि-क्रियांएँ-षटकर्म Yogic Shatkarma जानिए।
Yogic Shatkarma

  

(1)नेती :-   नेती के बहुत प्रकार हैं लेकिन यहाँ केवल जल नेती का ही परिचय दिया जा रहा है।

      जलनेती के लिए एक विशेषप्रकार का लोटा, ‘नेतीलोटा’ उपयोग में लिया जाता है। एक लोटा भरकर शुद्ध पानी लें। उसमे आधा चम्मच नमक डालें। पहले पानी को उबालिए, फिर उसे ठंडा होने दें और उसे कुनकुना बना लें। मोरी या बेसिन के सामने खड़े रहें , कुछ आगे की तरफ झुकिये, सिर को बाई और झुकाइये और लोटे की नाली को दाए नथुने में डालिए। सिर को और अधिक झुकने दीजिये तथा लोटे को ऊँचा कीजिये ताकि दाए नथुने में प्रविष्ट जल बाएं नथुने से बाहर निकलने लगे। इस क्रिया को एकाध मिनट तक जारी रखिये , अंत में लोटे की नाली को दाए नथुने से बाहर निकाल लें। अब लोटे की नाली को बाएं नथुने में डालिए और सिर को दाईं तरफ झुकाइये ताकि बाएं नथुने में प्रविष्ट पानी दायें नथुने से बाहर निकलने लगे। इस क्रिया को एकाध मिनट तक चालू रखिये।


अंत में 15-20 बार छींककर(नाक में से हवा बाहर निकालकर) नाक में अवशिष्ट पानी बाहर निकाल डालें। इस प्रकार नाक को सुखा लेना बहुत जरूरी है।


 * (1) नथुने से प्रविष्ट पानी मुहँ में आ जाने पर उसे थूक दें, उसे निगल न जाएँ।

 * (2)जलनेती करते समय पहले-पहल एक-दो बार नाक में जलन होगी, छींकें आएँगी और आँखों में आँसू आ जायेंगे। ये सब स्वाभाविक है, आप दो चार दिनों में ही इस क्रिया से अभ्यस्त हो जायेंगे।


सामान्यतः दिन में एक बार सुबह के समय करना ठीक है। जुकाम के समय या नाक बंद होने समय जलनेती दिन में 2-3 बार कर सकते हैं।


 लाभ :-


(A) नाक की सफाई होती है ।

(B)नाक में भीतर स्थित ज्ञानतन्तु के छोर (Nerve-Endings) अधिक क्रियाशील बनते हैं।

(C)यह क्रिया जुकाम, सर्दी, सायनस के दर्द , सिरदर्द और आधाशीशी का बहुत बढ़िया इलाज है।

(D)जलनेती के बाद प्राणायाम अधिक अछे ढंग से किया जा सकता है।  


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(2) धौती :-


धौती के विभिन्न प्रकारों में से यहाँ केवल वमन धौती (कुंजन क्रिया) के बारे में ही बताया जा रहा है। 2 लीटर कुनकुना पानी लीजिये । उसमें 3-4 चम्मच नमक मिलाएं , 6-8 गिलास शीघ्रता से पी जाएँ। मितली होते ही आगे की ओर झुकिए और पहली 3 उँगलियों को मुंह में गहराई तक उतारकर जीभ के पिछले भाग में दबाब दीजिये, फौरन उलटी द्वारा पानी बाहर निकलने लगेगा। पेट में गया हुआ सम्पूर्ण पानी जब तक बाहर न निकल जाए तब तक मुंह में उंगलियाँ डालकर उलटी करना जारी रखिये।

Note :

(1) धौती सुबह –सुबह खाली पेट करें।

(2)इस क्रिया में पानी शीघ्रतासे पीना अत्यावश्यक है।

(3) उँगलियों के नाखूनों को अच्छी तरह काट और घिस लेना चाहिए ।

(4) वमन धौती के बाद आधे घंटे तक किसी प्रकार का आहार न लें।

(5) आमाशय के उपदंश, उच्च रक्तचाप, ह्रदय रोग और हर्निया से पीड़ित लोग वमन धौती नहीं करें।


कितना बार करें – सामान्यतः सप्ताह में 1 बार।


 फायदे :-

(1) पाचन – तंत्र मजबुत बनते हैं।


(2) पेट में मौजूद अनावश्यक तत्व, पित्त, अम्ल और गैस का निष्कासन हो जाता है।


(3) अपच, पुराना जुकाम और दमे जैसे रोंगों में वमन धौती से अच्छा लाभ होता है।


   इसके बाद इन 5 आसनों को कीजिये

 


A. ताड़ासन :-

 

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दो पैरों के बिच आधे फूट का अंतर रखकर खड़े रहिये। एक हाथ की उँगलियों को दुसरे हाथ के साथ की उँगलियों में फसाकर दोनों हाथ उपर की ओरले जाइए । पैर की एडियोंको जमीन से उपर उठाइये और सिर को पीछे की ओर झुकाकर हाथ की उँगलियों की ओर नजर कीजिये। शरीर को उपर की ओर तानिये । इस तनी हुई स्थिति में शरीर को थोड़े देर तक स्थिर रखिये। फिर धीरे-धीरे पहले की स्थिति में आ जाइए । इसे 8 बार कीजिये।


B.  तिर्यक ताड़ासन : -

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सबसे पहले ताड़ासन की स्थिति में आइये। पैरों की एडियों को जमीं से उठाए रखकर शरीर को पहले दाई ओर और फिर बाई ओर झुकाइये । शरीर मुख्यतः कमर से झुकना चाहिए। इसे हर तरफ 8 बार कीजिये। 


C. कटि चक्रासन : -

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दोनों पैरों के बिच लगभग 2 फुट का अंतर रखकर खड़े रहिये । दोनों हाथ शरीर शरीर की तरफ कंधे के बराबर उपर उठाइये, अब शरीर को कमर से दाई ओर घुमाकर , बाया हाथ दायें कंधे पर लाइए और दायाँ हाथ पीठ के पीछे ले जाइए । इसके बाद शरीर को पहले की स्थिति में लाकर बाईं ओर घुमाइए। इसे दोनों ओर 8 बार कीजिये। 


D. तिर्यक भुजंगासन : -

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जमीन पर औंधे लेट जाइए। हथेलियों को कंधों से सटाते हुए जमीन पर टिकाइए। पीठ के स्नायुओं की सहायता से धड़ और सिर को उपर कीजिये। हाथों पर कम से कम वजन आये ऐसा कोशिश कीजिये । अब सिर और धड़ को दाई ओर घुमाकर बाएं पैर की एड़ी को देखिये। इसके बाद सिर और धड़ को बाईं ओर घुमाकर दाईं पैर की एड़ी को देखिये। अंत में मूल स्थिति में आ जाइए। इस आसन को 8 बार कीजिये। 


E. उदर करसनासन : -

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घुटने मोड़िये, जमीन पर तन कर बैठ जाइए। हथेलियाँ घुटनों पर रखिये, अब बाएं घुटने को निचे जमीन पर ले जाइए ; धड़ को यथासम्भव बाईं ओर मोड़िये और बाईं ओर से पीछे की तरफ देखिये। पुनः मूल स्थिति में आ जाइए। इसके बाद इस आसन को दूसरी ओर से भी कीजिये। इसे प्रत्येक ओर से 8-8 बार कीजिये।


लाभ :-


इन 5 आसनों को क्रम में करने से आमाशय और गुदा के बिच स्थित कुछ खास स्नायु (Sphincter Muscles) क्रमशः शिथिल होते हैं। परिणामस्वरूप मुंह से पिया गया पानी नमकीन पानी आहार और मल को लेकर गुदा की ओर सरकने लगता है।

 (3) नौली :-


यह पेडू के स्नायुओं का एक व्यायाम है। दोनों पैरों के बीच एकाध फुट का अंतर रखकर खड़े रहिए। थोड़ा-सा आगे की ओर झुकिए और पैरों को घुटनों से थोड़ा-सा मोड़िए। हथेलियों को घुटनों से कुछ ऊपर जाँघों पर टेकिए। गहरी साँस लीजिए। इसके बाद धीरे-धीरे साँस छोड़ते जाइए और पेडू तथा पेट को पीठ की तरफ संकुचित कीजिए। इसे उड़ियान बंध कहा जाता है। अब हथेलियों से जाँघों पर दबाव देकर संकुचित पेडू के स्नायुओं को नीचे की ओर ठेलिए। पेडू के बीच स्थित खड़े स्नायु आगे की ओर आ जाएँगे। इसे मध्यम नौली कहा जाता है। अपनी शक्ति के अनुसार यह स्थिति कुछ समय तक बनाए रखिए। फिर धीरे-धीरे साँस लेते जाइए और पेडूके स्नायुओं को ढीला करते जाइए।

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इस क्रिया के दौरान दोनों हाथों से जाँघों पर समान रूप से दबाव न दिया जाए अर्थात् दाई या बाई जाँघ पर अधिक दबाब देने से क्रमश: केवल दाई ओर के अथवा बाई ओर के स्नायुओं को आगे लाया जा सकता है। इन स्थितियों को क्रमश: दक्षिण नौली और वाम नौली कहते हैं।

कुछ दिनों के अभ्यास के वाद ये तीनों प्रकार की नौली क्रियाएँ क्रमानुसार की जा सकती हैं; इसे नीली-चालन कहते हैं।

Note :


(1) नौली क्रिया मल-मूत्र का विसर्जन करने के बाद खाली पेट करें ।


(2) प्रथम उउड्डीयान पर प्रभुत्व प्राप्त कीजिए। तत्पश्चात् क्रमश: मध्यम नौली, दक्षिण नौली, वाम नौली और अन्त में नौली-चालन सीखिए।


(3) नौली की समग्र क्रिया के दौरान उउड्डीयान जारी रहना चाहिए।


(4) इस क्रिया में अनुभवी योग-शिक्षक का मार्गदर्शन आवश्यक है।


(5) सगर्भावस्था में और उच्च रक्तचाप, हृदयरोग या पाचन-तंत्र के तीव्र रोग के रोगियों को नौली नहीं करना चाहिए।

 पुनरावर्तन : प्रतिदिन प्रातःकाल।


 लाभ :-


(1) इस क्रिया से पेट और पेडू के अवयवों को अच्छा व्यायाम मिलता है।


(2) इस क्रिया से आँतों में स्थित मल गुदा की ओर सरकने लगता है। इस प्रकार नौली पुरानी कब्जियत का भी अमोघ इलाज है।


 (4) बस्ति :-

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Yogic Shatkarma


इस क्रिया में आंतों में पानी चढ़ाकर आंतों को साफ किया जाता है। सफलतापूर्वक बस्ति करने के लिए पहले तो नौली पर प्रभुत्व प्राप्त करना जरूरी है। हौज, नदी या तालाब में इस प्रकार खड़े रहिये जिससे नाभि तक पानी का स्पर्श हो(या उत्कटासन की स्थिति में बैठ जाइए) । इसके बाद मध्यम नौली करने के साथ ही पानी गुदाद्वार से बड़ी आंत में चढ़ने लगता है। जिस समय सन्स रोकने की शक्ति पूर्ण हो जाय (अर्थात नौली छोड़ने की स्थिति में) उस समय गुदाद्वार बन्द कर दीजिए; ताकि पानी बाहर न निकल जाए। फिर से मध्यम नौली कीजिए और गुदाद्वार से ऊँगली हटा लीजिए। पुन: आंत में पानी चढ़ने लगेगा। इस प्रकार से 5-7 बार करने से आंत में पर्याप्त मात्रा में पानी चढ़ जाएगा। यदि संभव हो तो नौलीयान कीजिए और पानी को थोड़ी देर रोके रखिए। अन्त में आप पानी से बाहर आएँ और उचित स्थान पर जाकर मल-विसर्जन कीजिए।


Note :-

(1) इस क्रिया के लिए अनुभवी योगशिक्षक का मार्गदर्शन आवश्यक है।


(2) बस्ति प्रात:काल जल्दी खाली पेट कीजिए।


(3) जो लोग नौली न कर सकते हों वे बस्ति के लाभ एनिमा द्वारा प्राप्त कर सकते हैं।

पुनरावर्तन : सप्ताह में एक-दो बार।


 लाभ :(1)

बस्ति क्रिया द्वारा बड़ी आंत में संचित मल का निष्कासन हो जाता है। इस प्रकार बस्ति कब्जियत का अचूक इलाज है।

(2) बस्ति से आंत विशेष कार्यक्षम होती हैं।


(5)त्राटक :-

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Yogic Shatkarma


 किसी भी वस्तु पर दृष्टि को स्थिर रखने के व्यायाम को त्राटक कहते हैं। सुखासन में बैठिए। चेहरे से डेढ़-दो फुट की दूरी पर एक जलती मोमबत्ती, कोई छोटा चित्र या कोई काला बिन्दु रखें। आँखों को शिथिल करके दृष्टि को सतत उस वस्तु पर स्थिर रखिए। पलकें भी स्थिर रखिए। आँखें थकने पर अथवा उनसे पानी बह निकलने पर आँखें बन्द कीजिए और उस वस्तु की कल्पना कीजिए। थोड़े समय के बाद आँखें खोलिए और पुन: त्राटक कीजिए। इस प्रकार की क्रिया 4-5 बार कीजिए। 

Note :-

(1) यदि त्राटक योग्य ढंग से न हो तो आँखें को हानि हो सकती है। अत: इसमें किसी अनुभवी शिक्षक का मार्गदर्शन आवश्यक है।


(2) यदि आप मोमबती की ज्योति पर त्राटक कर रहे हों तो ऐसे स्थान पर बैठिए जहाँ हवा का आना-जाना कम हो और अँधेरा भी हो।

पुनरावर्तन : प्रतिदिन दिन के समय एक या दो बार।


लाभ :-


त्राटक से आंखें सुदृढ़ और दृष्टि तेजस्वी बनती है। परोक्षत: त्राटक से मस्तिष्क और मन पर शुभ प्रभाव होता है।


 (6) कपालभाति :-

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कपालभाति अर्थात् कपाल, खोपड़ी और मस्तिष्क को तेजस्वी बनाने की क्रिया । सुखासन या पद्मासन में बैठिए। शरीर को तना हुआ सीधा रखिए। दोनों हथेलियों को अपनी-अपनी तरफ के घुटनों पर टिकाइए। श्वासोच्छवास की क्रिया खास पद्धति से कीजिए। तेजी से साँस लीजिए, फिर पेट-पेडू के स्नायुओं को भीतर की ओर संकुचित करके बलपूर्वक साँस बाहर निकालिए। यह क्रिया तेजी के साथ (मिनट में 60 से 120 की गति से) करते रहिए। दो-एक मिनट के बाद कपालभाति बंद करके श्वासोच्छ्वास को सामान्य होने दीजिए।


Note:

(1) कपालभाति के दौरान छाती और कन्धों को स्थिर रखिए।


(2) कपालभाति करते समय पेट का खाली होना आवश्यक है।


(3) उच्च रक्तचाप या हृदयरोग से पीड़ित व्यक्ति यह क्रिया न करें।


पुनरावर्तन : प्रतिदिन प्राणायाम करने से पूर्व।

लाभ :


(1) यह क्रिया समग्र श्वसनतंत्र को अनुपम लाभ पहुँचाती है। इस क्रिया के दौरान रक्त का शुद्धीकरण तेजी के साथ होता है।


(2) कपालभाति से मस्तिष्क शांत बन जाता है।