Tratak Sadhna Kya Hai ?  त्राटक साधना क्या है ?

किसी भी स्थूल या सूक्ष्म पदार्थ को एकटक देखने की क्रिया को त्राटक कहते हैं। किसी भी वस्तु स्वाभाविक गति, बिन्दू, आकृति, ज्योति, दीप, तारे, ग्रह, नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य, देव मूर्तियां, चित्र को अपलक दृष्टि से देखने की क्रिया को त्राटक कहते हैं। 


Tratak Sadhna में किसी भी प्रकट या अप्रकट वस्तु पर आँखें स्थिर करना या ध्यान को एकाग्र करना आवश्यक होता है। अब प्रश्न उठता है कि यदि किसी वस्तु को अपलक देखना ही त्राटक है, तो यह साधना बहुत सरल है। इतनी सरल साधना के बारे में यदि यह कहा जाता है कि यह एक आध्यात्मिक साधना है और इस साधना से आत्म शक्ति का विकास किया जा सकता है, तो मन में कुछ प्रश्न उत्पन्न होना स्वाभाविक है। इस Tratak Sadhna से ही क्या साधारण मानव महामानव बन सकता है ? हां, यह सत्य है कि त्राटक साधना से आत्मा, महान आत्मा और मानव, महामानव बन सकता है। इसमें रंचमात्र भी संदेह नहीं मात्र इतना समझ लेना कि त्राटक की साधना किसी वस्तु, ज्योति, बिम्ब, प्रतिबिम्ब को अपलक देखने की क्रिया है, तो यह पूर्ण सत्य नहीं है। इसलिये हर व्यक्ति साधना नहीं कर सकता। जो लोग Tratak Sadhna करते हैं, वे मात्र इतना ही समझकर करते हैं कि अपलक किसी वस्तु को निहारते रहना ही साधना है और इसी तरह कुछ दिनों तक या कुछ महीनों तक अपलक कुछ देर तक किसी वस्तु को देखते रहने से उन्हें सफलता मिल जायेगी और वे साधना की सिद्धि प्राप्त कर लेंगे (बहुत लोगों ने इस प्रकार महीनों तक प्रतिदिन या दिनभर में दो बार त्राटक साधना की, फिर भी सफलता नहीं प्राप्त हुई। कुछ लोगों ने हार मानकर यह साधना छोड़ दी, कुछ लोगों ने इस साधना की त्रुटियां निकाली, कुछ लोगों ने इस महान साधना को बकवास कहकर आलोचना की, परन्तु कुछ लोगों ने अपने गुरु से सम्पर्क कर अपनी कमी या साधना में होने वाले दोषों को दूर किया । तब उन्हें कुछ दिखाई पड़ा। तब साधना की शक्ति, चमत्कार और प्राथमिक ज्ञान शक्ति प्राप्त होती दिखाई पड़ी ।


वास्तव में Tratak Sadhna  में साधक ऊपरी बातें ही समझ लेता है। वह मात्र इतना ही समझता है कि किसी वस्तु को अपलक कुछ देर तक देखने की क्रिया से ही त्राटक साधना पूर्ण हो जाती है । वैसे यह क्रिया तो सही है ही, किन्तु इसका मूल रहस्य है ध्यान । वास्तव में
जब आपका ध्यान केन्द्रित रहेगा और केन्द्रित ध्यान से आप किसी वस्तु को अपलक देखेंगे, तभी यह साधना पूर्ण मानी जायेगी ।

दीपक त्राटक साधना कैसे करे ?

Tratak Sadhna Kya Hai ? Dipak Tratak Kriya Vidhi Aur Fayde दिपक त्राटक क्रिया विधी और फायदे
Tratak Sadhna Kya Hai ? Dipak Tratak Kriya Vidhi Aur Fayde दिपक त्राटक क्रिया विधी और फायदे



दीपक त्राटक को ज्योति त्राटक भी कहते हैं क्योंकि इसमें ज्योति पर त्राटक करना होता है। विदेशों में दीपक के स्थान पर मोमबत्तियां प्रयुक्त होती हैं। इसलिये वे ज्योति पर त्राटक करने के लिये मोमबत्तियों का चुनाव करते हैं किन्तु हम भारतीयों के यहां मोमबत्तियां बहुत कम प्रयुक्त होती हैं। दीपक का प्रयोग अडिग होता है, इसलिये हमें दीपक की लौ पर त्राटक करना चाहिये । वैसे भी मैं मोमबत्तियों का निषेध करता हूं, क्योंकि मोमबत्तियां मोम से न बनाकर चर्बी से बनाई जाती हैं। मांगलिक स्थानों एवं पूजाघरों में तो इन मोमबत्तियों का प्रयोग करना ही नहीं चाहिये । यदि वास्तव में मोम द्वारा बनी मोमबत्ती हो, तो उस पर त्राटक करना उचित होगा ।


Tratak Sadhna में दिपक और तेल का चुनाव 

 दीपक विभिन्न आकार-प्रकार के होते हैं। आप उनमें से कोई भी दीपक चुन सकते हैं। डमरू के आकार का दीपक चुनें तो हर्ज नहीं। उसके डगमगाने या हिलने का भय नहीं रहता और उसकी लौ सीधी रहती है। दीपशिखा को कम ज्यादा करके अपने अनुकूल किया जा सकता है । बत्ती के छोटी-बड़ी होने पर उसे सुधारा जा सकता है। भभक कर जलने का भय नहीं रहता । अतः दीपशिखा (लौ) एक समान सदैव बनी रह सकती है। फिर भी साधक चाहे तो अपने अनुकूल किसी भी प्रकार का दीपक प्रयोग कर सकता है। उसे तो दीपशिखा पर त्राटक करना है। दीपक की लौ एक समान मोटी, ऊंची रहनी चाहिये । ऐसा कोई दीपक जो आपको ठीक लगे, साधना के लिये चुनें और उसमें कपास की बत्ती लगाकर घी से भर दें। दीपक में सरसों, राई, सोयाबीन का तेल प्रयुक्त कदापि न करें । ऐसा कोई तेल प्रयोग न करें जिसकी सुगन्ध में झार आती हो गाय का घी सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है । फिर भैंस आदि पशुओं का घी अच्छा होता है। घी न मिलने अथवा महंगा प्रतीत होने पर तिल, नारियल, मूंगफली इत्यादि मीठे तेलों का प्रयोग किया जा सकता है। अच्छे रिफाइन्ड तेल का भी प्रयोग किया जा सकता है। मेरा परामर्श है कि देशी घी का ही प्रयोग करें। एक दिन की साधना में एक चम्मच घी से अधिक नहीं लगता है। महीने भर में एक पाव शायद लगे। महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों को प्राप्त करने के लिये सौ-पचास रुपये महीने का खर्च वहन करना ही होगा। मन शुद्धि अवश्य कर लें। जो लोग नित्य पूजा-उपासना करते हैं, वह पूजा-उपासना करने 

" साधना में बैठने से पूर्व व्यायाम, योग, प्राणायाम, विश्राम करने के बाद तन शुद्धि के बाद Tratak Sadhna करे। पहले दिन साधना की तैयारी इस तरह करें कि बैठने का आसन 'एक मीटर चौड़ा और एक मीटर लम्बा हो । कुश आसन, मृग चर्म, व्याघ्र चर्म, कम्बल, कपास का आसन प्रयोग में ला सकते हैं। इनमें से सबसे अच्छा आसन कम्बल का होता है क्योंकि इस पर बैठने से कष्ट नहीं होता। यह कुचालक, आरामदायक एवं शुद्ध होता है । ऊनी वस्त्र को प्रतिदिन धोने की आवश्यकता नहीं पड़ती, इसे झाड़ देने पर ही वह शुद्ध हो जाता है, ऐसा शास्त्रीय वचन है । आज मृग चर्म एवं व्याघ्र चर्म प्रतिबंधित हैं, इनका प्रयोग नहीं किया जा सकता । इसलिये ऊनी वस्त्र का आसन ही इस साधना के लिये श्रेष्ठ एवं उत्तम है।

दीपक को अपनी आंख की ऊंचाई पर रखने की व्यवस्था करें । पहले के समय में हर घर में लकड़ी का दीवट होता था, जिसमें यह व्यवस्था थी कि दीपक रखने वाले स्थान को ऊपर-नीचे किया जा सकता था । आप चाहें तो ऐसा दीवट बनवा सकते हैं, अन्यथा लकड़ी का सीधा दीवट बनवा लें । उस ऊंचाई का, जो जमीन पर बैठने में आपकी गर्दन की ऊंचाई का हो ताकि डमरू वाला दीपक रखने के बाद दीपशिखा आपके नेत्रों के सामने और सीध में आ सके। आपको पहले ही दीपक जलाकर नाप कर देख और समझ लेना चाहिये। मेरे कहने का उद्देश्य यह है कि दीपशिखा और आपकी आंखें एक ही ऊंचाई पर रहें। आप चौकी अथवा तख्त पर दीपक रखने की व्यवस्था भी कर सकते हैं। दीपक की लौ आंखों की सीध में होनी चाहिये और लौ से आंखों की दूरी तीन फीट होनी चाहिये। इस बात का पालन कड़ाई से होना चाहिये । आप दीपक कैसे रखेंगे, कहां रखेंगे, उसके लिये क्या व्यवस्था करेंगे, यह आपके ऊपर है ।

जो लोग पूजा-उपासना करते हैं, उनके लिये मेरा परामर्श यह है कि वे पूजा-स्थल पर ही दीपक त्राटक साधना करें। इससे एक पंथ दो काज वाला मुहावरा चरितार्थ हो जायेगा । पूजा में दीपक जलाते ही हैं, जोत जलाते ही हैं और देशी घी का ही दीपक जलाते हैं तो उसी दीपक पर त्राटक कर लें। बस, बैठने पर आपकी आंख की ऊंचाई जो हो, उतनी ऊंचाई दीपक की जोत की करने की व्यवस्था करनी होगी। पूजा-स्थल का वातावरण भी आपके लिये अनुकूल होगा और धनात्मक प्रभाव देगा, जिससे आपके चित्त और मन की एकाग्रता सरलता से बन सकेगी। त्राटक साधना में मन की आंखों से देखना आवश्यक है। जो लोग पूजा-स्थल पर साधना नहीं करना चाहते, वे एकान्त कमरे में साधना करें । कमरे का वातावरण शांत हो, दरवाजे, खिड़की बंद हों, पंखे चाहें तो लगायें चाहें न लगायें, किन्तु यह ध्यान रखें कि सूर्य का तेज प्रकाश कमरे में न आये, पंखा नहीं चला सकते क्योंकि दीपक की लौ हिलनी, कांपनी नहीं चाहिये। यहां मेरा उद्देश्य यह है कि वातावरण शांत हो, बाहर का तेज प्रकाश न आये और दीपक की दीपशिखा बार-बार विकम्पित न हो । इसके लिये आप अपनी सुविधा के अनुसार व्यवस्था कर सकते हैं। खुले स्थान में यह साधना नहीं की जा सकती हूँइस साधना के लिये सबसे उपयुक्त समय सूर्योदय के पूर्व और सूर्यास्त के बाद का होता है। इस समय को आध्यात्मिक भाषा में प्रातः संध्या और सायं संध्या कहते हैं।

अब आप इन्द्रियों को नियंत्रण में करके मन-चित्त एकाग्र करें और टकटकी लगाकर एकटक, बिना पलकें झपकाये दीपशिखा की ओर देखते रहें। आपको दीपशिखा के अग्र भाग को देखना है (पहले-पहल आप पूरी दीपशिखा को देखने का अभ्यास करें। धीरे-धीरे ऊपर की ओर देखने का अभ्यास करते हुये दीपशिखा के शिखर तक पहुंच जायें, किन्तु यहां तक पहुंचने के लिये महीने भर का समय लगायें। सबसे पहले लाल रंग की फुलझड़ियां दिखाई पड़ेंगी, लाल के बाद नारंगी, पीला, हरा, हल्का नीला, बैंगनी रश्मियां नाचती हुई दिखाई पड़ेंगी। ये रश्मियां कभी तेज, कभी धीमी गति से नाचती दिखाई पड़ेंगी। जिस तरह आतिशबाजी की चकरी चमकीले एवं रंगीन प्रकाश वाली होती हैं और जैसे वह नाचती हैं, वैसे ही दीपशिखा पर बना चक्र भी पहले सुनहरी चकरी की तरह नाचता दिखाई पड़ेगा और बाद में सतरंगी, इन्द्रधनुषी रंगों वाली चकरी की तरह नाचता दिखाई पड़ेगा। यह स्थिति भी काफी दिनों तक ऐसी ही बनी रहेगी। अब साधक को समझ लेना चाहिये कि उसकी दीपक त्राटक साधना बिलकुल ठीक दिशा में चल रही है और सफलता की ओर जा रही है।

उपर्युक्त अनुभवों के बाद साधक को विचित्र एवं चामत्कारिक दृश्य दिखाई पड़ेंगे। कभी दीपशिखा अपने मूल को छोड़कर काफी ऊंचाई पर हिलती-डुलती दिखाई पड़ेगी । कभी उससे चिनगारियां निकलेंगी और उन्हीं चिनगारियों से कोई चित्र, कोई मूर्ति, कोई दृश्य बनता दिखाई पड़ेगा । यह दृश्य अथवा मूर्तियां साधक को बड़ी प्यारी एवं लुभावनी लगेंगी और उसका मन करेगा कि अन्य दिनों की अपेक्षा आज काफी देर तक साधना करता रहे और यह दृश्य देखता रहे, किन्तु उसे ऐसा नहीं करना चाहिये । प्रतिदिन की भांति निश्चित अवधि तक ही साधना करें । यदि चिनगारियों से बने हुये दृश्य साधक के मन में भय, शंका और क्रोध उत्पन्न करते हैं तो साधक को चाहिये कि वह तुरन्त आंखें बंद कर ले और उस दिन की साधना वहीं समाप्त कर दे।साधक यदि कुचेष्टा करके साधना को आगे बढ़ाता है तो अपने लिये अशुभ करता है। अपनी आंखों की ज्योति कम करने से लेकर मानसिक विकार, मिर्गी, पागलपन के दौरे, यहां तक कि पक्षाघात का आक्रमण भी सहना पड़ सकता है। मैं प्रारम्भ से कह चुका हूं कि त्राटक साधना की सफलता मन को चित्त एवं एकाग्रता पर निर्भर करती है । जब मन एकाग्र एवं स्थिर हो जाता है और उसे किसी प्रकार का बाह्य या आंतरिक व्यवधान सहन करना पड़ता है तो वह किसी भी प्रकार से विकृत हो सकता है । मन का विकृत होना जीवन का विकृत हो जाना है। अतः साधक को चाहिये कि भयप्रद स्थितियों में साधना को तुरन्त बंद कर दे। मैंने यह भी स्पष्ट किया है कि Tratak Sadhna बताये गये सारे निर्देशों का अक्षरशः पालन करना चाहिये। अपने मन से, जिज्ञासा से, हड़बड़ी में, कुचेष्टा से, जिद से साधना का कोई भी स्तर पार करने की चेष्टा न करें, अन्यथा कुप्रभाव भोगने पड़ सकते हैं। जो साधना आपको दिव्य आत्मा, महामानव बना सकती है। और अहं ब्रह्माश्मि की श्रेणी में ले जा सकती है, वही साधना कुमार्गी होने पर साधक का जीवन नष्ट कर सकती है। अब यही आपका लक्ष्य है, दीपशिखा के ऊपरी भाग पर ही। 

आपकी Tratak Sadhna उसी दिन से प्रारम्भ हो गयी, जिस दिन से आपने दीपक की लौ (दीपशिखा) को देखना प्रारम्भ किया। चाहे मध्य भाग को देखा, चाहे निम्न भाग को देखा अथवा ऊपरी भाग को । दीपक त्राटक का सबसे बड़ा लाभ यही है कि साधक को चामत्कारिक दृश्य पहले दिन से ही दिखाई पड़ने लगते हैं। जिन किरणों को अथवा आभा मण्डल को साधक बिन्दू त्राटक आदि में महीनों की साधना के बाद देख पाता है, उन्हें दीपक त्राटक में एक सप्ताह में ही देख लेता है, कुछ लोग पहले दिन ही देख लेते हैं। उसका कारण भी स्पष्ट है, दीपक की लौ स्वयं में एक ज्योति है और उस ज्योति में प्रकाश भी होता है और आभा भी होती है । किरणें बिखेरना दीपक का स्वाभाविक गुण है। इसीलिये पहले दिन की त्राटक साधना में साधक को दीपशिखा से किरणें फूटती दिखाई पड़ना प्रारम्भ हो जाती हैं। कभी-कभी प्रकाश-पुंज भी दिखाई पड़ जाता है। कभी दीपशिखा से स्फुलिंग (चिनगारियां) उड़ती दिखाई देती हैं। कभी दीपशिखा स्वयं उड़ती हुई दिखाई पड़ती है । यह सब पहले दिन से दिखना साधना के क्रम में नहीं है। साधक को जिस दिन दीपक की दीपशिखा अदृश्य (गायब) होती हुई दिखाई दे, अथवा अंधकार दिखाई दे, उस दिन से साधना का प्रारम्भ मानना चाहिये । बिन्दू त्राटक में बिन्दू स्वयं काला रहता है और जब वह चमकीले प्रकाश से परिपूर्ण दिखाई पड़ता है, तब बिन्दू त्राटक की साधना का पहला चरण प्रारम्भ माना जाता है,जबकि दीपक त्राटक में दीपशिखा प्रकाश एवं किरणें बिखेरती है और साधक को प्रकाश की अपेक्षा अंधकार दिखाई पड़ता है तो त्राटक का प्रथम चरण प्रारम्भ मानना चाहिये । अंधकार के बाद प्रकाश और प्रकाश के बाद अंधकार बार-बार दिखाई पड़ेगा । दूसरी स्थिति में दीपक की एक दीपशिखा के स्थान पर तीन-तीन, चार-चार दीपशिखायें दिखाई पड़ेंगी । कुछ ही देर में ऐसा लगेगा कि दीपशिखा दीपक से अपना संबंध तोड़ चुकी है और दीपक से एक इंच की ऊंचाई पर हिल-डुल रही है अर्थात् दीपशिखा और दीपक के बीच में अंधकार दिखाई पड़ेगा। फिर उसी ऊंचाई पर कई दीपशिखायें हिलती- डुलती दिखाई पड़ेंगी । कुछ पल में दीपशिखा अपनी वास्तविक स्थिति में दिखाई पड़ेगी। दीपशिखा का यह खेल बार-बार होता रहेगा और अगले कुछ दिनों तक चलता रहेगा।

अगले चरण में दीपशिखा से किरणों का जाल फूटेगा। फिर प्रकाश पुंज दिखाई पड़ेगा, फुलझड़ियां निकलती दिखाई पड़ेंगी। कभी-कभी प्रकाश-पुंज, किरणों का जाल, फुलझड़ियों का समूह ऊपर-नीचे, दायें, बायें चलता हुआ दिखाई पड़ेगा। यह स्थिति भी कई दिनों तक बनी रहेगी। अगले चरण में दीपशिखा से आतिशबाजी होगी। किरणें नाचती हुई, गोलाकार चक्र बनायेंगी। कभी धीमी गति से कभी तेज गति से, वह चक्र नाचता हुआ दिखाई पड़ेगा। फिर चक्र में रंग भरना प्रारम्भ हो जायेगा। 'दीपशिखा की चिनगारियों से बनने वाले लुभावने चित्रों को देखते रहना शुभत्व का प्रतीक है। जो साधक यहां तक पहुंच गया, उसे समझ लेना चाहिये कि उसने आधी साधना पूरी करके आधी सिद्धि प्राप्त कर ली है किन्तु यह एक वर्ष की निरन्तर साधना में ही सम्भव हो सकेगा। आगे की साधना तलवार की धार पर चलने के समान होगी। यहां तक पहुंचा साधक आधा महामानव बन जाता है। यही वह स्थिति है, जब साधक नीचे गिरने की सम्भवानाओं से गुजरने लगेगा । प्रायः अधिकांश साधक यहां तक पहुंचकर फिर विचलित हो जाते हैं। धीरे- धीरे उनकी Tratak Sadhna कम होती जाती है, टूटती जाती है, बिखरती जाती है ।

एक वर्ष पश्चात साधना मे कमी होने का कारण... ?

साधना का पतनोन्मुख होना, साधक की श्री वृद्धि के कारण होता है। इसे मैं और स्पष्ट करूं तो आप समझ जायेंगे। मैंने यह बात पहले भी स्पष्ट कर दी है कि त्राटक साधना से आध्यात्मिक, आत्मिक, सामाजिक, आर्थिक, भौतिक एवं लौकिक सभी प्रकार का विकास होता है। इसी को एक शब्द में कहें तो श्री वृद्धि होती है। आत्मिक और आध्यात्मिक विकास सांसारिक, आर्थिक एवं भौतिक विकास की तुलना में काफी विलम्ब से प्रारम्भ होता है । चूंकि आर्थिक एवं भौतिक विकास पहले प्रारम्भ हो जाता है, इसलिये व्यक्ति साधनात्मक जीवन की तुलना में सांसारिक जीवन जीने को विवश हो जाता है। आर्थिक, भौतिक, सामाजिक विकास के कारण वह सांसारिक जंजाल में फंस जाता है। धीरे-धीरे उसका लगाव अपनी सांसारिक उपलब्धियों में बढ़ता जाता है और वह अहं ब्रह्मास्मि के पथ से विचलित हो जाता है। इसी को मैं ईश्वर द्वारा प्रदत्त चाकलेट कहता हूं । साधक को ज्ञान मार्ग की हो अथवा भक्ति मार्ग की हो, ईश्वर द्वारा यह चाकलेट साधक को कई बार, कई स्तर में दी जाती है, ताकि वह चाकलेट चूसता रहे, मौज करता रहे, सांसारिकता का सुख भोगता रहे और उसकी साधना अधर में ही समाप्त हो जाये । त्राटक साधना में भी यही होता है। उपर्युक्त वर्णित अर्धसिद्धि तक पहुचने में कई बार साधक को चाकलेट मिलता है । जहां पर जिस स्तर पर चाकलेट पाकर साधक बहक जाता है, उसकी साधना वहीं पर अधोगति को प्राप्त हो जाती है।

ऐसा सभी साधकों के साथ हो, यह आवश्यक नहीं है, दृढ़ इच्छा शक्ति वाले साधक अपनी साधना आगे बढ़ाते हैं। हालांकि ऐसे साधक बहुत कम होते हैं, फिर भी दृढ़ इच्छा शक्ति एवं आत्म-विश्वासी साधक भौतिक, आर्थिक उपलब्धियों को उपेक्षित कर साधना पथ पर अग्रसित होते हैं। ऐसे लोगों को साधना करते समय अब दीपशिखा में देवी-देवताओं की चमकीली, पके हुये सोने के रंग जैसी मूर्तियां दिखाई पड़ती हैं । कभी-कभी कमल के फूल, गुलाब के फूल, सोन जूही के फूल एवं चम्पा के फूल दिखाई पड़ते हैं । आगे के स्तर में मूर्तियों के आभायुक्त चेहरे दिखाई पड़ेंगे, पूरा शरीर दिखाई नहीं पड़ेगा। आभा- मण्डल के बीच में आकर्षक, लुभावनी मुखाकृतियां दीपशिखा के चारों ओर दिखाई पड सकती हैं। कभी एक, कभी दो, कभी चार अलग-अलग आकृतियां दिखेंगी और कभी एक ही आकृति दो, तीन, चार की संख्या में दिखाई पड़ती रहेगी। त्राटक साधना आगे बढ़ी तो यही आकृतियां कभी गुलाब के फूलों पर, कभी कमल के फूलों पर दिखाई देंगी । कभी मुस्कुराती हुई, कभी रोती हुई, कभी प्रेम प्रदर्शित करती हुई, कभी क्रोध प्रदर्शित करती हुई दिखाई पड़ेंगी। साधक को यहां दो प्रकार से सावधान रहना है। पहला तो यह कि उक्त दृश्यों के आने से पूर्व साधक को बड़े-बड़े ‘चाकलेट' मिलना शुरू हो जायेगा । साधक यदि आधी सिद्धि के बाद मिले ‘चाकलेट’ पर नहीं फिसला तो यहां अवश्य फिसल जायेगा । इस स्थिति पर उसे इतना वैभव मिलेगा कि यदि सामने स्वयं ब्रह्म अपने साथ स्वर्ग ले जाना चाहता हो, तो भी साधक इन्कार कर देगा क्योंकि सांसारिक सुख सामने हैं और स्वर्गिक सुख कल्पना में हैं।

जो सामने है, उसे भोगे अथवा ईश्वर के साथ जाकर अनिश्चितता की स्थिति में रहे ? पता नहीं वहां का सुख उसे रास आयेगा भी या नहीं? ऐसी स्थिति में वह मोक्ष, परमानन्द, अहं ब्रह्मास्मि की श्रेणी आदि का विचार भी मन से निकाल देगा और सांसारिक विषय- वासनाओं में निर्लिप्त होकर साधना पथ से विमुख हो जायेगा क्योंकि जो सामने है, वही सत्य भाषित होता है। यदि उक्त स्थिति तक पहुचंकर साधक आगे बढ़ना चाहता है तो वह समझ ले कि अब वह अहं ब्रह्मास्मि के बहुत निकट है । उसे जब हंसते-रोते दैवीय चेहरे दिखाई पड़ें, तो वह सावधान हो जाये । यही दूसरी सावधानी है। यहां साधक को हंसते-रोते चेहरों में विभेद करना होगा। जिन चेहरों से शोक, दुःख, भय का आभास मिलता हो और उनकी आवृत्ति बार-बार हो, तो साधक को उस दिन की साधना बंद कर देनी चाहिये । यदि दूसरे दिन, तीसरे दिन भी अशुभ भावनाओं के चेहरे दिखाई पड़ें तो प्रतिदिन कुछ क्षणों की साधना करके बंद कर देनी चाहिये, किन्तु साधना पर बैठे ही नहीं अथवा यह सोच ले कि दो-चार दिन बाद साधना फिर से शुरू करेंगे, तो यह अनुचित होगा । चेहरों का भाव समझें । हंसते एवं शुभ भावना वाले चेहरे आपको प्रोत्साहित कर रहे हैं कि साधना को आगे बढ़ायें और लक्ष्य तक ले जायें, किन्तु इनकी संख्या और अवधि कम होगी। अशुभ भावना वाले चेहरे आपको साधना से विरत कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि आप साधना आगे न बढ़ायें, यहीं राके दें और सांसारिक एवं लौकिक सुखों का आनन्द उठायें। साथ ही वह यह भी इंगित कर रहे हैं कि आपके जीवन में, परिवार में कोई घटना घटने जिससे कुप्रभावित होकर आपको साधना छोड़नी पड़ेगी। इसीलिये दैवीय चेहरे रो रहे हैं,शोक प्रकट कर रहे हैं।

यदि आप जीवन अथवा परिवार में घटने वाली घटना से कुप्रभावित हुये और यह सोचकर कि कुछ दिनों बाद सामान्य स्थिति होने पर पुनः साधना का क्रम जारी रखेंगे, तो समझ लें कि अब नहीं तो कभी नहीं वाली बात चरितार्थ हो जायेगी क्योंकि साधना का क्रम यदि टूटता है तो फिर बन नहीं पाता। साधक को इतना वैभव मिल चुका होता है कि उसका भटक जाना स्वाभाविक होता है। इस स्तर पर पहुंच जाने के बाद ही नहीं, वरन् पहले से ही साधना में विघ्न, बाधायें निरन्तर आती रहती हैं। पहले विघ्न-बाधाओं का स्तर सामान्य रहता है, किन्तु ज्यों-ज्यों साधना सफलता की ओर चलती है, विघ्न-बाधाओं का स्तर गम्भीर होता जाता है । यहां तक कि वे हृदय विदारक हो जाती हैं । ऐसे में साधक का विचलित होना स्वाभाविक है। आखिर वह भी तो एक साधारण मानव ही है।

त्राटक साधना के लिए दृढ़ संकल्प और लक्ष्य की जरूरत 

दृढ़ संकल्प और लक्ष्य मैं इस लिए  कहना चाहता हूॅ क्यूँकी मैंने अपने जीवन में बहुत सी ऐसी घटनायें देखी हैं जो साधना-पथ से मुझे विचलित करने के लिये पर्याप्त थीं और कभी-कभी मैं विचलित भी हुआ हूं, किन्तु फिर संभल कर साधना के तार जोड़ता रहा हूं। कामाख्या वाले गुरुजी के माता-पिता का देहान्त एक दुर्घटना में अचानक हुआ था। उस समय वे शमशान साधना एवं शव - साधना कर रहे थे। उनका छोटा भाई उन्हें बुलाने आया तो उन्होंने जाने से इंकार कर दिया। उसने कहा- 'जाओ अंतिम संस्कार कर दो। मैं यहां तर्पण कर दूंगा- मुझे संसार में मत खींचो ।' संयोग से मैं उस समय वहीं था। भाई के चले जाने पर उनकी मुद्रा शांत एवं गम्भीर हो गई थी। मैं समझ सकता था माता-पिता के वियोग का गम आस्था की जड़ें हिला देता है. किन्तु न मैं बोला न वे बोले। आधे घंटे बाद उन्होंने कहा जा पानी ला। मैंने पानी लाकर दिया। उन्होंने पानी पिया और फिर शांत हो गये। कुछ देर बाद उठते हुए बोले- पानी से काम नहीं चलेगा। अपनी झोली उठाई और शमशान घाट की ओर चले गये। मैंने समझ लिग कि अब इन्हें तीर्थ और समाधि ही शोक मुक्त करेगी। यह एक सच्चा उदाहरण है। इस तरह के नजाने कितने संस्मरण मेरे मन-मानस में बुदबुदा रहे हैं। समयाभाव है। फिर कभी... । मैं कह रहा था कि Tratak Sadhna के उच्च स्तर पर पहुंचने वाले साधक को दारुण विपदाओं से गुजरना पड़ता है। इसीलिये इस स्तर की साधना पर चलना तलवार की धार पर चलने के बराबर कहा गया है। फिर भी जो साधक अपनी समस्त मोह-माया पर नियंत्रण कर लेता है और पूर्ण इन्द्रिय-निग्रह करके सांसारिकता से विमुक्त हो जाता है, वही आगे बढ़ सकता है । जो साधक जल में निवास करने वाले कमल के फूल और पत्ते की तरह जरूपी माया-मोह एवं सांसारिकता में रहते हुये उनके कुप्रभाव से वंचित एवं सुरक्षित रह सकता है, वही आगे की साधना करके अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।


क्या त्राटक साधना से मोह माया का त्याग होता हैं ?

बिरला साधक और आगे बढ़ता है तो उसे दीपशिखा में अलौकिक चित्र दिखाई पड़ हैं। अब रोते हुये, दुःखी एवं अशुभ दैवीय चेहरे नहीं दिखाई देते। जिस दिन से अशुभ चेहरे दिखाई देना बंद हो जायें और शुभ चेहरे ही दिखाई पड़ते रहें, तो साधक को समझना चाहिये कि अब उसकी साधना निर्विघ्न चलेगी। उसका मन सांसारिक वैभव से स्वतः हट जायेगा। आध्यात्मिक सुख एवं चेतना प्राप्त होने लगेगी और उसके मन-मानस में आनन्द की वर्षा होने लगेगी। वह आनन्द सुख नहीं होगा, बाह्य नहीं होगा, सांसारिक नहीं होगा। वह आनन्द आंतरिक होगा, आत्मा का होगा, परमात्मा का होगा और परमानन्द होगा। तुल्य अब तक साधक की आत्मा शुद्ध, निर्मल और पवित्र हो चुकी होगी । वह परमात्मा हो चुकी होगी। स्वयं को ब्रह्म घोषित करने की स्थिति में आ चुकी होगी। अहं ब्रह्मस्मि कहने का द्वार खुल चुका होगा। अब साधक को मानव मंदिर में ही नहीं, प्रत्येक आणी के मन-मंदिर में आत्मा रूपी परमात्मा के दर्शन होने लगेंगे । उसे घर से न मतलब, न संसार से मतलब, न बंधु-बांधवों से मतलब, न माता-पिता, न पत्नी-पुत्र से मतलब, न मकान से न दुकान से मतलब, न धन से, न ऐश्वर्य से, न दुःख से न सुख से, न अपने से न पराये से कोई मतलब नहीं रह जायेगा । वह जीने के लिये खायेगा, शरीर रक्षा के लिये पहनेगा और प्राण रक्षा के लिये सोयेगा। वही प्राण जिसकी रक्षा उसे तब तक करना है, जब तक वह महाप्राण में मिल नहीं जाता । अब साधक को कमल और गुलाब पर आसीन मुखौटे कुछ दिन ही दिखाई पड़ेंगे। धीरे-धीरे दीपशिखा की चिनगारियों से दूसरी आकृतियां बनेंगी। सगुण रूप में परमात्मा के दर्शन होंगे। जिन देवी-देवताओं को आपने सगुण एवं साकार रूप में पूजा है, उसी रूप में वह अपनी साज-सज्जा के साथ दिखाई पड़ेंगे। साधक को लगेगा कि वे अपने वरदहस्त से उसकी ओर आशीर्वाद की किरणें फेंक रहे हैं, अर्थात् साधक की दृष्टि किरणों की ओर जा रही है, दीपशिखा की ओर जा रही है और दीपशिखा की किरणें साधक की दृष्टि के माध्यम से नेत्रों में आ रही है । तात्पर्य यह कि परावर्तन एवं आवर्तन की क्रिया एक साथ, एक जगह हो रही है, भले ही इन किरणों के आवर्तन में चिनगारियों से बने चित्रों की हथेलियों का माध्यम हो अर्थात् साधक को लगेगा कि किरणें उसके देवी-देवताओं की वर मुद्रा में उठी हथेलियों से आ रही हैं, किन्तु वास्तव में किरणें परावर्तित हो रही हैं दीपशिखा से ही। वास्तव में परावर्तित होने के लिये दीपशिखा के उस पार कोई दर्पण होना चाहिये । उस अदृश्य दर्पण का स्वरूप ले लिया है हथेलियों ने। वास्तव में यही है आत्मा और परमात्मा के मिलन और संयोग का चित्र। कितना अद्भुत, कितना अलौकिक, कितना आश्चर्यजनक अनुभव होगा उस साधक को,


जिसने कठोर परिश्रम करके और सांसारिक सुखों का त्याग करके यहां तक की यात्रा की हो और अपने लक्ष्य तक पहुंचकर अहं ब्रह्मास्मि की श्रेणी में आ गया हो । अब उसे क्या चाहिये, जब उसकी आत्मा स्वयं परमात्मा में विलीन हो गई है। अब उसे तब तक रहना है, जब तक यह शरीर जीर्ण न हो जाये अथवा सांसारिक जीवन की अवधि पूरी न हो जाये । अंत में जब आत्मा के सांसारिक निवास की अवधि पूरी हो जायेगी, तब वह शून्य शिखर के गढ़ से अर्थात् ब्रह्माण्ड से जगमगाती दीपशिखा की ज्योति के समान निकलकर पलक झपकते ही सातों आकाशों को पार करती हुई परमात्मा में मिल जायेगी । आत्मा का परमात्मा में विलय हो जायेगा, शिव-शक्ति का संगम हो जायेगा, बूंद सागर में मिलकर सागर हो जायेगी ।मैं भलीभांति जानता हूं कि इस स्तर तक पहुंचने वाले साधक इस धरती पर कभी- कभी अवतरित होते हैं। हर साधक यहां तक नहीं पहुंच सकता। ऐसा समझकर किसी साधक को निराश नहीं होना चाहिये कि वह अपने लक्ष्य तक तो पहुंच ही नहीं पायेगा, तो फिर त्राटक साधना प्रारम्भ क्यों करे ? त्राटक साधना ही नहीं अन्यान्य साधनाओं के लिये भी कोई यही बात सोच सकता है। नहीं... ऐसा नहीं है । त्राटक साधना हो अथवा अन्य कोई साधना हो, साधक को विभिन्न प्रकार की उपलब्धियां तो देती ही हैं, ऐसा मेरा विश्वास है । जिस घर में सुबह-शाम देवार्चन पूजा, आरती, हवन इत्यादि होता रहता है, उस घर की प्रगति अवश्य होती रहती है। मैं विशेष साधना-उपासना की बात नहीं कर रहा हूं, सामान्य पूजन-अर्चन की बात कर रहा हूं। भौतिक सुख एवं भौतिक प्रगति तो हर व्यक्ति को दिखाई देती है, किन्तु आध्यात्मिक एवं आत्मिक प्रगति किसी को दिखाई नहीं देती। व्यक्ति को भौतिक एवं सामाजिक प्रगति को देखकर अनुमान लगा लेना चाहिये कि पूजन-अर्चन से जितनी ऐसी प्रगति हुई है, उससे कहीं अधिक आत्मिक एवं आध्यात्मिक प्रगति गुप्त रूप से हो गई है। हालांकि यह प्रगति गुप्त रूप से होती है और प्रारम्भ में इसका अनुभव व्यक्ति को नहीं हो पाता, किन्तु धीरे-धीरे

उसकी समझ में अपनी आत्मिक एवं आध्यात्मिक प्रगति का ज्ञान हो जाता है। कोई भी अपने आस-पड़ोस, मौहल्ले-टीले का सर्वेक्षण करके पूजा-पाठ करने वाले परिवारों का इतिहास अथवा भूत-वर्तमान जान सकते हैं, देख सकते हैं । यह तो सामान्य पूजा करने वालों की उपलब्धियां होती हैं । जब कोई विशेष साधना करेगा अथवा Tratak Sadhna करेगा, तो उसकी उपलब्धियां भी विशेष होंगी/और उत्तम होंगी । वह कुछ ही नहीं तो भी साधना से आम से विशेष व्यक्ति तो अवश्य हो जायेगा । उसके व्यक्तित्व में चुम्बकीय शक्ति आ जायेगी । त्राटक साधक की उपलब्धियां बताते समय मैंने यह कहा था कि आत्मिक चेतना, प्राण ऊर्जा को विकसित करने में त्राटक साधना सहायक होती है और भौतिक एवं आर्थिक स्थिति दूसरों की अपेक्षा मजबूत होती है अथवा पहले की अपेक्षा अच्छी होती जाती है। साधक की दृष्टि में आकर्षण, वशीकरण से शक्ति आ जाती है। लोग स्वयं साधक का आदर करने लगते हैं और उससे प्रेम करने लगते हैं। अतः साधक को लक्ष्य तक पहुंचने की चिन्ता न करके प्रारम्भिक साधनायें प्रारम्भ कर देना चाहिये । 

क्या ज्योति त्राटक में मोमबत्ती का उपयोग कर सकते है?

ज्योति त्राटक एवं दीपक के लिये मोमबत्तियों का प्रयोग भी किया जा सकता है |विदेशों में हिप्नोटिज्म तथा मिस्मेरिज्म सीखने वाले लोग तथा भविष्य की घटनाओं की जानकारी करने वाले, व्यक्तिगत भविष्य बताने वाले लोग मोमबत्तियों का प्रयोग अपनी साधनाओं में करते हैं । क्रिस्टल-बॉल द्वारा भविष्य बातने वाले, भविष्य वक्ता क्रिस्टल बॉल एवं मोमबत्तियों का प्रयोग करते हैं। चूंकि मोमबत्तियों का प्रयोग पश्चिमी देशों में अधिक होता है, भारतीयों जैसे दीपक वहां नहीं जलते, इसलिये दीपक के बारे में, दीपक के महत्त्व के बारे में उनका ज्ञान शून्य है। मोमबत्तियों पर आप भी त्राटक साधना कर सकते हैं। थोड़ी-बहुत कठिनाइयों के साथ मोमबत्तियों पर की जाने वाली त्राटक साधना सफल भी होगी। इसके लिये आपको अच्छी गुणवत्ता से युक्त मोमबत्ती लानी होगी और यह सुनिश्चित भी करना होगा कि जब- जब आपको नई मोमबत्ती की आवश्यकता हो, तब-तब आपको उसी गुणवत्ता की मोमबत्ती प्राप्त हो जायेंगी, अन्यथा आपको उसी गुणवत्ता वाली ढेर सारी मोमबत्तियों को खरीदकर सुरक्षित रखना होगा । मोमबत्ती गुण वाली हो, रंगीन न हो सफेद हो, टेढ़ी-मेढ़ी या किसी आकृति वाली न हो, जलाने पर उनकी दीपशिखा एक जैसी हो और किसी भी प्रकार की दुर्गन्ध न निकलती हो। 


मोमबत्ती स्टेण्ड का चुनाव कैसे करे?

मोमबत्तियों के चुनाव के बाद मोमबत्ती स्टेण्ड का चुनाव करना चाहिये। बाजार में पीतल, स्टील और लोहे के मोमबत्ती स्टेण्ड आकार एवं कई आकृतियों और कई रूप-रंग के मिलते हैं, उनमें से आपको 6 इंच ऊंचा मोमबत्ती स्टेण्ड लाना चाहिये, अथवा आसन मुद्रा में बैठने पर आपको उसकी ऊंचाई जितनी हो, उतना लम्बा मोमबत्ती स्टेण्ड बनवा लें अथवा खरीद लें। मेरा कहने का आशय यह है कि साधक को बिना पलकों को, ऊपर या नीचे किये दीपशिखा को देखना है। स्टेण्ड और मोमबत्ती की ऊंचाई नाक के आधे भाग की ऊंचाई के बराबर हो । तब दीपशिखा की ऊंचाई आंखों के सामने होगी। अब साधक अपने विवेक से स्टेण्ड और मोमबत्ती की ऊंचाई निर्धारित कर ले। केवल मोमबत्ती से या छोटे स्टेण्ड से भी काम चला सकता है। तब आपको तिपाई, मेज या स्टूल का सहारा लेना पड़ेगा । सबसे अच्छा एवं सस्ता स्टेण्ड लोहे की गोल सपाट सरिया से बन सकता है जिसमें नीचे वजनदार लोहे का बेस लगवा दें और ऊपर लोहे की छोटी कटोरी। ऊंचाई साधक स्वयं नापकर निश्चित कर सकता है। स्टेण्ड की अपनी आंखों की सीध में ढाई से तीन फीट के मध्य रखकर दीपक त्राटक के समान साधना प्रारम्भ कर देना चाहिये । अन्य बातें दीपक त्राटक के समान होंगी और साधक का अनुभव और प्रतिफल भी उसी के समान होगा। 


मोमबत्ती पर त्राटक करने के दोष

मोमबत्ती पर त्राटक करने का पहला दोष यह दिखेगा कि दिन-प्रति-दिन मोमबत्ती घटती जायेगी। दीपक त्राटक में ऐसा नहीं होता । मोमबनी घटने से दीपशिखा की ऊंचाई भी घटती जाती है, जिससे निरन्तर पलकों को झुकाकर साधना करनी होती है, जो दोषपूर्ण है। दीपशिखा की ऊंचाई निरन्तर घटती जाती है। उसे पहले की ऊंचाई पर लाने के लिये हर दिन स्टेण्ड को ऊंचा करना पड़ता है। ऐसा करना सही नहीं होता क्योंकि एक सेंटीमीटर, दो सेंटीमीटर मोमबत्ती के घटने से जो कमी आई, उसे बढ़ाने के लिये स्टेण्ड के नीचे इतनी पतली चीजें लगाना मुश्किल हो जाता है। कभी दीपशिखा की ऊंचाई बढ़ जाती है तो कभी घट जाती है। यहां तक कि मोमबत्ती घटते-घटते समाप्त हो जाती है, जबकि दीपक के साथ ऐसा नहीं होता । घी, तेल समाप्त होने पर दीपक बुझ जायेगा, किन्तु तब तक साधना की अवधि पूरी हो जाती है। 

मोमबत्ती जब गलती है तो गला हुआ भाग मोमबत्ती के ऊपर चिपकता जाता है और Tratak Sadhna में अवरोधक का काम करता है, जबकि दीपक त्राटक में ऐसा अवरोधक कभी नहीं आता।मोमबत्ती की लौ अर्थात आकार-प्रकार एक ही अवधि में बदल सकता है, जो साधना में अवरोधक का काम करता है। कभी-कभी मोमबत्ती की लौ से चिट-चिटाहट की आवाज करती हुई चिनगारियां निकलती हैं जो अवरोधक का कार्य ही नहीं करतीं वरन् साधक की आंखों के लिये हानिकारक भी हो सकती हैं। मोमबत्ती से एक प्रकार की गंध आती है जो साधक के मन की एकाग्रता को कुप्रभावित करती है। भले ही धीरे-धीरे करे, उसका एहसास न हो परन्तु लम्बे समय बाद साधक के लिये हानिकारक सिद्ध हो सकती है। यह गंध चर्बी की मोमबत्ती में अधिक तथा शहद के छत्तों से बनी मोम की मोमबत्तियों में कम होती है।


Tratak Meditation में गाय का घी का उपयोग करे

 दीपक में गाय का घी, देशी घी का प्रयोग इसलिये किया जाता है कि उसके जलने में एक सुगन्ध आती है जो मन को प्रसन्न करती है और मन की एकाग्रता में सहायक होती है। धीरे-धीरे उसकी सुगन्ध का प्रभाव पड़ता रहता है और मन की एकाग्रता में सुधार आता रहता है। इससे साधना में अनुकूलता एवं अनुभवशीलता आती रहती है । देशी घी का भारतीय जीवन में अपना विशिष्ट महत्त्व है। देशी घी में भी गाय के घी का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्त्व है। जब गाय का घी उपलब्ध नहीं होता, तभी भैंस या अन्य पशुओं का घी प्रयुक्त किया जाता है । गाय के शरीर में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की उपस्थिति मानी जाती है, इसलिये धार्मिक कार्यों में गोमूत्र, गोबर का रस, गाय का घी, गाय का दूध एवं गाय के दूध का दही का प्रयोग किया जाता है । यह मिश्रण पंचगव्य कहलाता है और कायाकल्प के लिये भी प्रयुक्त होता है । 

अतः दीपक में गाय का शुद्ध घी प्रयोग करना चाहिये ।


Tratak Meditation मे कुछ वर्जित चीजें 

वल्ब या सेल या बैटरी से जलने वाले छोटे वल्बों में ज्योति त्राटक साधना कदापि न करें । कुछ लोग दीपक की तरह बने बिजली या बैटरी से चलने वाले लैम्पों में साधना करने की बात पूछते हैं, यह गलत है, हानिकारक है। इससे नेत्रों की ज्योति के साथ मानसिक शक्ति भी कुप्रभावित होगी। अतः कदापि न करें ।


नोट:-   हमारे द्वारा बताई गई जानकारी त्राटक साधना के किताब से लिया गया है , जिसके लेखक रमेश चंद्र श्रीवास्तव जी है , इस आर्टिकल मे बताई गई साधना को गुरू के सानिध्य में करे । जिससे आपकी साधना में कोई विघ्न नहीं आयेगा।और आपके गुरू आपके शरीर की रक्षा भी करेंगे। 


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