मूर्ति त्राटक Marti Tratak:

ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिये मूर्ति त्राटक सबसे उपयोगी एवं शीघ्र सफलता देने वाली साधना है । मूर्ति त्राटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे जाने-अनजाने में सभी लोग करते हैं । जो लोग मूर्ति-पूजक हैं और नित्य प्रातः-सायं पूजा, उपासना करते हैं, वे उसी अवधि में मूर्ति त्राटक भी कर लेते हैं अथवा यह कहें कि उनसे मूर्ति त्राटक स्वयमेव हो जाता है और वे यह नहीं जान पाते कि वे जो क्रिया कर रहे हैं, वह त्राटक है । वास्तव में वे अपने भगवान को मूर्ति में देखना चाहते हैं, इसलिये मूर्ति की ओर टकटकी लगाकर देखते रहते हैं, टकटकी लगाकर देखना ही त्राटक है। वह प्रतिदिन सुबह-शाम त्राटक कर रहे हैं,


मूर्ति त्राटक कैसे करे ? Murti Tratak Kaise Kare ?
मूर्ति त्राटक कैसे करे ? Murti Tratak Kaise Kare ?



किन्तु वे ऐसा नहीं समझ पाते क्योंकि त्राटक साधना के बारे में उन्हें कुछ ज्ञान नहीं होता, वेतो मूर्ति में देवी-देवता, भगवान और अपने इष्ट के दर्शन करना चाहते हैं। उन्हें दर्शन होते भी हैं, और उसी रूप में होते हैं जिस रूप रेखा की उनकी मूर्ति होती है। वे अपनी साधना को त्राटक साधना के रूप में परिभाषित नहीं कर सकते, किन्तु मैं उनकी पूजा-उपासना में हो रही स्वाभाविक त्राटक साधना को परिभाषित कर सकता हूँ । आपने दीपक त्राटक, बिम्ब त्राटक आदि साधनाओं के विवरण में यह पढ़ा होगा कि लक्ष्य अर्थात् दीपक की लौ या काला बिन्दू पहले स्तर की साधना में कांपता है, ऊपर-नीचे आते-जाते दिखाई देता है, फिर उसमें से रश्मियां फूटती हैं, फिर प्रकाश पुंज दिखाई देता है, . फिर फुलझड़ियां दिखाई पड़ती हैं, फिर आभायुक्त सुनहरी किरणें छोड़ते फूल दिखाई पड़ते हैं, फिर देवी-देवताओं के चित्र अथवा साधक के प्रियजनों के चित्र अथवा साधक की भावनाओं के चित्र दिखाई देते हैं। 

यदि आपने दीपक त्राटक के बारे में नहीं पढा है तो आप नीचे दिए गए दिपक त्राटक साधना पर click कर के पढ़ सकते हैं 👇👇

 

दिपक त्राटक साधना क्या है ? दिपक त्राटक क्रिया विधी और फायदे


अब मूर्ति उपासक से यदि पूछें कि कभी-कभी उसकी पूजनीय मूर्ति में आभा दिखाई देती है, चेहरे से रश्मियां फूटती दिखाई देती हैं ? कभी अलौकिक प्रकाश दिखाई देता है? कभी साक्षात् मूर्ति का देवता दिखाई देता है ? कभी वह विराट रूप में, कभी वह सूक्ष्म रूप में दिखाई देता है ? उपासक कहते हैं, उन्हें भगवान के दर्शन होते हैं । भगवान अपने भक्तों को साक्षात् प्रकट होकर दर्शन देते हैं। वास्तव में भगवान प्रकट नहीं होते । उपासक की भावना एवं कल्पना में जो चित्र भगवान का बना है, वही चित्र, वहीं स्वरूप उस समय मूर्ति में प्रकट हो जाता है, जब उपासक का मन एकाग्र होता है,

टकटकी लगाकर देखती हैं और अंतर्चक्षु खुल जाते हैं अर्थात् जब उपासक तुरीयावस्था में पहुंच जाता है, तो उसके मन-मानस का चित्र मूर्ति में प्रकट हो जाता है, यही मूर्ति त्राटक है । जिन लोगों, भक्तों, उपासकों, साधकों को अपने को, अपने ईश्वर, भगवान, आंखें भगवती, देवी और इष्ट के दर्शन करने हों, उन्हें चाहिये कि वे मूर्ति त्राटक की साधना करें, इससे उनको उनकी पूजा, उपासना का आनन्द एवं फल तो मिलेगा ही, इष्ट के दर्शन होंगे और आध्यात्मिक चेतना एवं प्राण ऊर्जा का भी विकास होगा। भक्त को क्या चाहिये- भगवान, संत को क्या चाहिये - निर्वाण, उपासक को क्या चाहिये - आनन्द । भोग और मोक्ष, यही दो चीजें सबको चाहिये। सांसारिक भोग के उपरांत मोक्ष, किन्तु दोनों साथ नहीं मिलते । भोग चाहने वालों को भोग मिलेगा और मोक्ष चाहने वालों को मोक्ष मिलेगा, किन्तु कुछ लोग मध्य मार्ग अपनाते हैं। सांसारिक जीवन को सात्विक, नैतिक एवं धार्मिक मान्यताओं के आधार पर जीने एवं भोगने के बाद मुक्ति मार्ग पर चल पड़ते हैं। ऐसे लोग मध्यम मार्गी हैं, किन्तु ऐसा होना कठिन है- ऐसे लोग बहुत कम ही होते हैं ।

अध्यात्म का सिद्धान्त है कि संत ज्ञान मार्गी होते हैं और ज्ञान मार्गी लोग ब्रह्म को निर्गुण, निराकार मानते हैं और अपने जीवन का लक्ष्य अपनी आत्मा का परमात्मा में विलय मानते हैं-अर्थात् मोक्ष । दूसरे भक्त होते हैं अर्थात् भक्ति मार्गी, जो ब्रह्म को सगुण साकार मानकर उपासना करते हैं, उनके जीवन का लक्ष्य परमानन्द होता है अर्थात् आनन्द का भोग। विषय-वासनाओं का भोग नहीं । भक्त शिरोमणि तुलसीदास ने कहा है- जन्म-जन्म रति राम पद यह वरदान न आन । उपरोक्त सारी लालसायें, मनोकामनायें, लक्ष्य एवं उद्देश्य, चाहे संत के हों अथवा भक्त के अथवा आम आदमी के, मूर्ति त्राटक साधना के माध्यम से प्राप्त हो सकते हैं क्योंकि

मूर्ति त्राटक साधना से व्यक्ति का मन शुद्ध, निर्मल एवं एकाग्र होता है। दूसरे स्तर पर आत्मा का शुद्धिकरण होता है। आत्मा के ऊपर आवरण रूपी सांसारिक मैल, जो भोग और विलासिता के कारण जन्म-जन्मान्तर से लगी आयी है, वह धुलने लगती है और धीरे-धीरे आत्मा निर्मल होकर आत्मा-परमात्मा के समान अजर, अमर, शाश्वत एवं शुद्ध हो जाती है। फिर आत्मा की इच्छा, चाहे वह परमात्मा में मिले और मोक्ष प्राप्त कर ले, अर्थात् संसार के पुनरागमन से मुक्ति प्राप्त कर ले अथवा बार-बार पुनर्जन्म लेते हुये परमात्मा की भक्ति करे और परमानन्द प्राप्त करती रहे । यह सब मूर्ति त्राटक साधना से सम्भव हो सकेगा, जो चाहे करके देख लो । मूर्ति त्राटक में कोई नई व्यवस्था नहीं करनी है। जो पहले से मूर्ति पूजा कर रहे हैं, वे मूर्ति पूजा अपने ढंग से करते रहें। पूजन, अर्चन, स्तोत्र - पाठ, मंत्र जाप आदि करने के बाद उसी आसन पर बैठे-बैठे मूर्ति त्राटक करें। मूर्ति के चेहरे पर अपनी दृष्टि लगा दें, मन को एकाग्र करें और टकटकी लगाकर देखते रहें। जब आंखें थक जायें अथवा तनावग्रस्त हो जायें तो आंखें बंद कर लें, दबा लें, गीले कपड़े से पोंछ लें, फिर दोबारा मन को एकाग्र करें, दृष्टि को स्थिर करें और टकटकी लगाकर अपने भगवान को देखें । नित्य दैनिक पूजा में सुबह-शाम पांच से दस मिनट तक मूर्ति त्राटक करें ।

जो लोग पूजा, उपासना नहीं करते किन्तु उपरोक्त उपलब्धियां प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें मेरा परामर्श है कि पूजा-उपासना के प्रति आकर्षित हों और अपनी रुचि के अनुरूप देवी-देवता का चुनाव करें, फिर उन्हीं की आकर्षक मूर्ति लायें और उस पर मूर्ति त्राटक करें । मूर्ति का आकर्षक एवं लुभावनापन होना चाहिये । उपासक को त्राटक साधना के सिद्धान्तों का समावेश अपनी पूजा उपासना में जोड़ लेना चाहिये । यदि आपके इष्ट की मूर्ति, आपके बैठने के स्थान से तीन-साढ़े तीन फीट की दूरी पर रहे तो उत्तम रहेगा । इसी के साथ यह भी निर्धारित कर लें कि मूर्ति का चेहरा, आपके चेहरे की सीध में हो जाये और आपकी आंखों का सीधा दृष्टिपात मूर्ति के मुख मण्डल पर होता रहे । यदि मूर्ति की आंखों और आपकी आंखों की सीधाई एक ही होगी, तो मूर्ति त्राटक साधना में शीघ्र एवं उत्तम सफलता प्राप्त होगी।


नोट:-  अगर आपको हमारे द्वारा बताई गई जानकारी  मूर्ति त्राटक कैसे करे ? Murti Tratak Kaise Kare ? पसंद आये तो Like करे और Share करने अपने Freinds, Relative को ताकी सबको इसका लाभ मिल सके , ये जानकारी Tratak Sadhna Siddhi के किताब से लिया गया है ,जिसके लेखक रमेश चंद्र श्रीवास्तव जी है , हमारे द्वारा बताई गई साधना को गुरू के सानिध्य में करे । जिससे आपकी साधना में कोई विघ्न नहीं आयेगा।और आपके गुरू आपके शरीर की रक्षा भी करेंगे। 

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