सामान्य सूर्य त्राटक साधना अपने आप में प्रबल प्रभाव कारक माना जाता है, फिर भी Surya Tratak Sadhna करने की पूर्ण मनाही की जाती है। योग की चरम स्थिति में पहुंच जाने पर भले ही स्वयं की प्रेरणा से प्रेरित होकर कोई साधक इस साधना में तत्पर हो जाये, वह और बात है, किन्तु साधकों को अथवा प्रारम्भिक साधकों को सूर्य त्राटक साधना करने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि सूर्य की किरणों का प्रचण्ड ताप एवं तीव्र प्रकाश आंखों की रोशनी को शीघ्र ही छीन लेता है । सूर्य की किरणें जब शरीर के कठोर भागों को झुलसा देती हैं तो आंख और आंख के अन्दर का कोमल भाग कैसे बचा रह सकता है ? आंख के अन्दर रेटीना एक भाग है जो एक तरल द्रव के बीच रहता है। साधारण भाषा में उस द्रव को आंख का तेल बोलते हैं। सूर्य का तीव्र प्रकाश ही रेटीना एवं उसके चारों ओर के द्रव को सुखाने एवं जलाने के लिये पर्याप्त होता है, फिर सूर्य की प्रचण्ड किरणें तो पलभर में उसे नष्ट कर सकती हैं। अतः Surya Tratak नहीं करना चाहिये ।



Surya Tratak Sadhna Kaise Kare? सूर्य त्राटक साधना कैसे करे ?
Surya Tratak Sadhna Kaise Kare? सूर्य त्राटक साधना कैसे करे ?


सन् 1980 तक मैं भी यही समझता था और मानता था । प्रायः सूर्य को अर्ध्य देते समय एकाध पल के लिये बाल रवि की ओर देख लिया करता था। मन में इच्छा तो बहुत थी कि सूर्य त्राटक साधना करूं परन्तु डरता था कि कहीं आंखों की रोशनी चली गयी तो क्या करूंगा ? फिर तो जीवन ही व्यर्थ हो जायेगा। हां, दीपक त्राटक, बिम्ब त्राटक, मूर्ति त्राटक तो मैं करता ही था और उसके अच्छे परिणाम मिल रहे थे। मेरी आध्यात्मिक प्राण ऊर्जा का रहस्य त्राटक साधना ही है, यह बात मैं स्पष्ट कर चुका हूं, किन्तु उसी वर्ष अर्थात् सन् अस्सी में मुझे उत्तरांचल की यात्रा पर जाना पड़ा। वहां से एक बाबाजी आये थे अपनी कुछ समस्या लेकर लौटते समय मुझे जबरन लेते आये । लक्ष्मण झूला के पास उनका अपना छोटा सा आश्रम था । अवकाश भी था और हरिद्वार, ऋषिकेश में अपने पुराने साधकों, शिष्यों से मिलने का चाव भी था, सो उनके आग्रह पर चला आया। बड़े अपनत्व से उन्होंने हमें रखा । एक दिन गंगा के पावन तट पर बैठा दृश्य दर्शन कर रहा था और बाबा से धर्म चर्चा कर रहा था । मन इतना खो गया था कि समय का पता नहीं चला। सूर्य सिर पर चढ़ आया तो उसकी किरणें तन को चुभने लगी। बाबा ने कहा- अब चलना चाहिये, धूप तेज हो गयी है । मैं उठ गया किन्तु कुछ कदम चलने के बाद ठहर गया। बाबा ने पूछा- 'क्या हुआ ?' मैंने उन्हें कुछ दूर पहाड़ी-चट्टान पर खड़े एक व्यक्ति की ओर हाथ उठाकर संकेत किया और पूछा- 'क्या वह साधू सूर्य त्राटक साधना कर रहा है ?' 'हां, वह तो रोज करता है।'


‘आप उन्हें जानते हैं? क्या आप मुझे उनसे मिलवा सकते हैं? क्या वह मुझे Surya Tratak Sadhna की यह विधि बता सकते हैं? मैं भी त्राटक साधक हूं, किन्तु सूर्य त्राटक साधना करने का मेरा साहस नहीं होता।' एक साथ, एक सांस में मैंने अनेक प्रश्न कर दिये और अपने मन की बात भी कह दी। हां... हां..., सब हो जायेगा । वह मेरा मित्र है, चिदानन्द स्वामी नाम है। बहुत पहुंचा हुआ है, किन्तु बहुत बड़ा स्वाभिमानी है। एक दोष सबसे बड़ा है उसमें भी दोष है, वह क्रोधी है, साथ ही दयालु भी है। दीन-हीनों की सहायता करता है। उसमें प्रबल आत्म शक्ति और प्राण ऊर्जा है। वह कुछ भी कर सकता है। मैं समझ गया कि सूर्य त्राटक साधना है तो स्वाभिमानी भी होगा और क्रोधी भी। अग्नि तत्व की प्रधानता है उसमें । सूर्य शक्ति विद्यमान होगी उसमें । मन में तुरन्त मिलने की लालसा दौड़ गयी। कुछ कदम और आगे बढ़ा तो देखा कि वह चट्टान से उतरकर गंगा जी की ओर चला जा रहा था। हम और आगे बढ़ गये, फिर पलट कर देखा तो वह गंगा की धारा में डुबकी लगा रहा था। मैं सब समझ रहा था । वास्तव में दीपक त्राटक के बाद जैसे हम गीला रूमाल आंखों पर रखते हैं, वैसे ही वह सम्पूर्ण शरीर और आंखें शीतल कर रहा था । अपलक सूर्य को देखने से आंखों में ही नहीं, वरन् मस्तिष्क और शरीर में भी तपन भर जाती है। संध्या समय हम चिदानन्द स्वामी के पास गये। उस समय वह गो सेवा में जुटे थे। हमें देखकर मौन संकेत कर दिया कि उधर बैठें। बाबा जी के साथ मैं उनके कक्ष की ओर गया। वहां तख्तनुमा तीन चौकियां पहले से रखी थीं। कक्ष के बाहर वह लॉन जैसी खुली जगह थी ।बाबा जी ने मुस्कुरा कर कहा- देखा आपने, चिदानन्द को हमारे आने का आभास पहले से हो गया था, तभी तो तीन चौकियां बिछी हैं, उस पर कालीन की तरह का मुलायम आसन और गोल मसन्द पड़े थे। एक चौकी पर कालीन के ऊपर मृग चर्म बिछा था। मुझे अच्छा लग रहा था । वातावरण में हल्की सी ठण्ड थी । खुला वातावरण, हल्की-हल्की पवन और हवन कुण्ड से विस्तारित होता सुगंधित धुआं मन-मानस को प्रफुल्लित एवं हर्षित कर रहा था । मन ही मन में अपने आप से कहने लगा- यह वातावरण ही सन्यासियों, योगियों, तपस्वीगण और साधकों के लिये आनन्ददायी है, तभी तो यहां के साधकों को सफलता शीघ्र मिल जाती है। सिद्धि मिले अथवा न मिले, साधना में मन की एकाग्रता और आनन्द तो मिल ही जाता है। स्वच्छ प्रदूषण रहित वातावरण योग, भक्ति, ध्यानादि के लिये उत्तम होता है स्वयं अभिवादन करते हुये वे आये और अपने आसन पर विराजमान हो गये । अथवा मेरे साथ आये बाबाजी कुछ कहें, उससे पूर्व ही उन्होंने मेरी ओर संकेत करके कहा- आप त्राटक साधक हैं। बाहर गांव से आये हैं और मुझसे Surya Tratak Sadhna पर चर्चा करना चाहते हैं..., हैं न... अथवा और कुछ जिज्ञासायें हैं ?


मेरे हाथ जुड़ गये । आप तो त्रिकाल दृष्टा हैं। मेरे मन में चाहत थी कि मैं भी सूर्य त्राटक साधना करूं, कुछ दिनों तक बाल सूर्य पर त्राटक किया भी किन्तु भयवश छूट गया अथवा कहें कि संयम नहीं बना पाया । आप तो मध्याह्न सूर्य पर त्राटक कर रहे थे। आपको साधना करते देख जिज्ञासा हुई कि आपसे कुछ सीखूं-समझू । इसमें समझना क्या है, त्राटक साधना हो अथवा योग साधना, सभी में अभ्यास करना होता है। एक दिन में सीधे मध्याह्न सूर्य पर त्राटक तो नहीं किया जा सकता और न विलम्ब तक किया जा सकता है । धीरे-धीरे साधना प्रारम्भ की जाती है और निरन्तर बढ़ाई जाती है। तुम दीपक त्राटक और मूर्ति त्राटक करते हो ।

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 वह सरल है फिर भी धीरे-धीरे ही अभ्यास किया गया होगा, तब यहां तक सफल हुये हो । मैंने प्रारम्भ से सूर्य त्राटक साधना ही किया है। मेरे गुरु ने बचपन से ही सूर्य त्राटक साधना सिखाया था और अभ्यास कराया था। तुम उचित पात्र हो, स्वयं साधक हो, तांत्रिक हो और योग्य जिज्ञासु हो । इसलिये मेरा मन कहता है कि तुम्हें Surya Tratak Sadhna का प्रारम्भिक ज्ञान देकर तुम्हारी मनोकामना पूर्ण करूं । मैंने नतमस्तक होकर कहा- मैं अनुगृहीत रहूंगा। उन्होंने बताना प्रारम्भ किया- देखो सर्वप्रथम भोर में, ब्रह्म मुहूर्त में जागने-उठने का अभ्यास डालना होगा। तुम शहरी लोग देर से सोते हो और देर से जागते हो। जब भोर में उठने का पक्का अभ्यास हो जाये तो मन में दृढ़ संकल्प करो कि कल से सूर्य त्राटक साधना प्रारम्भ करूंगा। दूसरे दिन शौचादिक क्रियाओं से निवृत्त होकर खुली जगह पर खड़े होकर अथवा कुर्सी पर बैठकर बाल रवि को उगते, प्रकट होते देखो। देखते-देखते जब बाल रवि का सम्पूर्ण गोला आंखों के सामने आ जाये, तो पुतलियां उसी पर स्थिर कर दो। पलकें खुली रहें, पुतलियां स्थिर रहें और दृष्टि सूर्य के गोले पर टिकी रहे । अब धीरे-धीरे मन को भी स्थिर करो और मन को अपनी दृष्टि से जोड़ दो। मन केन्द्रित करो सूर्य के गोले पर । मन विकार रहित, किन्तु जैसे ही आंखों में तनाव, दर्द का अनुभव हो, वैसे ही पलकें भींच कर बन्द कर लो। यह हो गयी एक दिन की त्राटक साधना । मन कहे भी, इच्छा रहे तब भी, दुबारा सूर्य की ओर देखने का साहस न करो। यह भी आवश्यक है कि मन की न मानो। साधना में संयम और नियम भी आवश्यक होता है। दूसरे दिन दो बार, तीसरे दिन तीन बार, चौथे दिन चार बार और पांचवे दिन पांच बार, यही अभ्यास कर सकते हो, अर्थात् एक बार त्राटक करते-करते आंखें जब थक जायें तो आंखें बंद कर लो, फिर एक दो पल के बाद आंखों को धीरे-धीरे खोलो और त्राटक करो, फिर बन्द करो, फिर खोलो । यह आवृत्ति पांचवे दिन पांच बार होनी चाहिये। पांचवें दिन से पन्द्रहवें दिन तक केवल पांच बार ही करते रहो। सोलहवें दिन से एक-एक आवृत्ति बढ़ाते हुये दस बार तक ले जाओ। फिर सदैव के लिये दस बार की आवृत्ति निश्चित कर लो । दस बार का मतलब होता है अधिकतम दस मिनट, क्योंकि एक बार में एक मिनट से अधिक त्राटक करना सम्भव नहीं होता। पहले तो एक आवृत्ति क्रमशः 20, 25, 30, 40 सैकण्ड की होगी। धीरे-धीरे वह समय बढ़ता जायेगा। एक बात ध्यान में रखनी होगी कि आंखों पर किसी प्रकार का तनाव अनुभव करते ही आंखें बंद कर लेनी चाहिये। कभी-कभी ऐसा होता है कि साधक 30, 40 सैकण्ड तक की आवृत्ति पर पहुंच गया अथवा उससे अधिक 60 सैकण्ड की अविध तक अपलक देखने का अभ्यास कर चुका है, किन्तु 60 सैकण्ड के तीन चार आवृत्ति करने के बाद पांचवीं आवृत्ति में उसकी आंखों में तनाव आ गया या आंखें दुखने लगीं या आंखों से आंसू आने लगे, ऐसी स्थिति में आंखों को तुरन्त बंद कर लेना चाहिये और दोनों हथेलियों से दोनों आंखों को दबा लेना चाहिये । फिर भी आराम न मिले 'तो गीले रूमाल अथवा तौलिया से आंखों को पोछना चाहिये। फिर भी तनाव कम न हो तो पानी की छींटें मारकर धो लेना चाहिये । ऐसे अवसर पर किसी प्रकार की हठधर्मिता उचित नहीं। पानी से धोने या पोछने के बाद यदि आंखों को आराम मिल जाता है तो फिर से त्राटक कर सकते हैं अन्यथा उस दिन की साधना को वहीं पर रोककर दूसरे दिन से फिर प्रारम्भ करना चाहिये । इसमें कोई हानि नहीं होती। सूर्य पर तभी तक त्राटक का समय रखें, 


जब तक सूर्य पीला, नारंगी और सिन्दूरी रहे सिन्दूरी से लाल की दिशा में जाने के पूर्व ही साधना समाप्त कर लेनी चाहिये, अन्यथा हानि निश्चित है। दिन के सूर्य पर वही साधक त्राटक साधना कर सकता है जो कम से कम दस वर्षों तक निरन्तर सूर्य त्राटक साधना कर चुका है और उसने धीरे-धीरे अभ्यास करते हुये समय को बढ़ाया है।साधारण साधक अथवा नये साधक को कोई अधिकार नहीं कि वह लाल सूर्य के गोले पर त्राटक साधना करे । चिदानन्द स्वामी ने मुझे अपने अनुभवों के साथ विभिन्न प्रकार के त्राटक समझाये । उत्तरांचल में रहकर मैंने त्राटक साधना के विभिन्न पक्षों पर उनसे चर्चा की। बहुत कुछ उनसे सीखा । सूर्य त्राटक साधना के अनुभव : जब कोई साधक बाह्य आंखों के साथ मन की आंखों को और अपनी समग्र एकाग्रता को जोड़कर सूर्य त्राटक करता है तो उसे सर्वप्रथम सूर्य बिम्ब अपनी ही जगह पर नाचता दिखता है। कुछ दिन की साधना में वह बिम्ब काले, लाल, सुनहरे स्वरूप में बदलते हुये अपने ही स्थान पर दमकने लगता है अर्थात् आपको लगेगा, अनुभव होगा कि सूर्य बिम्ब आगे-पीछे, अन्दर-बाहर आ-जा रहा है। कभी-कभी वह लुप्त भी हो जायेगा और केवल काला, लाल, नारंगी, सुनहरा प्रकाश ही दिखाई देगा। फिर कुछ दिनों बाद सूर्य बिम्ब नाचता हुआ सुनहरी किरणें छोड़ता अनुभव होगा, फिर सप्त रंगों की किरणें दिखाई देंगी । इन्द्रधनुषी किरणें चारों ओर घूमती दिखाई पड़ेंगी । कुछ समय बाद उसके बिम्ब से स्फुर्लिंग छितरती नजर आयेगी। फिर फुलझड़ियां छूटेंगी । काफी समय तक साधना करते रहने पर साधक को सूर्य किरणों के जाल में पशु-पक्षी की आकृत्तियां बनती, बिगड़ती या झरती दिखाई पड़ेंगी और आगे साधना बढ़ेगी तो मानव आकृत्तियां सीधी या उलटी अथवा कुछ सीधी एवं कुछ उलटी सूर्य बिम्ब से झरती हुयी दिखाई पड़ेंगी। साधकों को ऐसा अनुभव होगा कि सूर्य बिम्ब के बीच में किसी गुफा का मुख्य द्वार है, एक होल, छेद सा दिखेगा और उस छेद के द्वार से मानव पुतले गिर रहे हों। अच्छे साधक एवं आध्यात्मिक ऊर्जा वाले साधकों को स्पष्ट अनुभव होगा कि सूर्य बिम्ब के इसी द्वार से हमारी सृष्टि का निर्माण हो रहा है । वहीं से इस सृष्टि का विकास हो रहा है। वहीं हमारी धरती का उद्गम स्थान है।


वास्तव में सूर्य ही हमारी पृथ्वी की उत्पत्ति और विकास का कारण है, इसीलिये सूर्य को जगत का पिता, जगत की आंखें कहा जाता है। वेदों में परमपिता की आंखों से सूर्य की उत्पत्ति कहा गया है, सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुलश्च । पुराण संहिता में बताया गया है कि सौर दर्शन चौबीस तत्वों को मान्यता देता है। ये 24 तत्व हैं- पंचभूत, पंचतन्मात्रा, दस इन्द्रियां, मन, बुद्धि, ज्ञान और प्रकृति । इन चौबीस तत्वों में सब कुछ आ गया । सामान्य व्यक्ति भी यह मानता है कि सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं। प्रकाश उन्हीं से मिलता है, जल के कारक वही हैं, बादलों को वही जन्म देते हैं, पृथ्वी को ऊर्जा एवं उपजाऊ शक्ति वही देते हैं। फसलों का नियंत्रण उन्हीं के द्वारा होता है। जीवों को ऊर्जा एवं ज्ञान - बुद्धि उन्हीं से मिलती है। एक ही वाक्य में कहा जाये तो सूर्य ही वह देव है जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं और हमारे इस लौकिक जीवन में सुख एवं सौभाग्य की वर्षा करते हुये देहावसान होने पर मुक्ति धाम देते हैं । प्राण ऊर्जा को प्रबल करना हो अथवा सांसारिक वैभव की लालसा हो अथवा मुक्ति मार्ग पर चलना हो, सभी लौकिक-अलौकिक उपलब्धियों के लिये सूर्य त्राटक साधना कर सकते हैं। सूर्य आत्म कारक है। अतः सर्वप्रथम साधक की आत्मा का विकास होगा। आत्मा का विकास अर्थात् सर्वांगीण विकास, आत्म चेतना जागरण होगा, प्राण ऊर्जा का विकास एवं प्रसार होगा । अग्नि तत्व का प्रादुर्भाव भी होगा। संहारक शक्ति का जनन होगा। व्यक्ति में क्रोध शक्ति प्रबल होकर हर क्षण उत्तेजना देती रहेगी। साधक सूर्य के समान त्रय शक्तियों का स्वामी हो जायेगा ।


जन्म, जीवन और मरण कहें अथवा जन्म विकासक, पालनकर्ता और संहारकर्ता, यही त्रय शक्तियां ईश्वर के पास हैं। विधाता सूर्य के पास भी यही शक्तियां हैं क्योंकि सूर्य ही प्रत्यक्ष देवता हैं। सूर्य के कारण इस धरती का जन्म हुआ है। सूर्य के कारण ही इस धरती पर घास-फूस से लेकर मानव एवं मानवोत्तर प्राणियों का जनन होता है। सूर्य ही मेघ, जल, मौसम का समीकरण कर एक तिनके से लेकर हम सभी का पालन-पोषण करता है और वही यहां की प्रत्येक वस्तु का जीव-निर्जीव का संहारक है। वही अमृत तत्व बरसाता है और वहीं विष तत्व प्रदाता भी है। सूर्य आगम-निगम संस्तुत और ज्ञान-विज्ञान सम्मत देवाधिदेव परम देवता हैं। उन्हें लोक जीवन के साक्षी और सांसारिक प्राणियों की आंखों का प्रकाशक कहा गया है। । इसीलिये उन्हें लोक साक्षी और जगञ्चक्षु कहा गया है। आकाश में परिभ्रमण करने के कारण उन्हें सूर्य कहते हैं- सरित आकाशे - इति सूर्यः । लोक को कर्म की प्रेरणा देने तथा लोक रक्षक होने के कारण उन्हें रवि की संज्ञा दी गयी है- सुवति कर्मणि लोकं प्रेरयति इति सूर्यः - सूर्यते इति रविः । रोग-संबंधी जीवाणुओं के शमन के लिये सूर्य किरणों की उपयोगिता चिकित्सा शास्त्र सम्मत है। वनस्पति शास्त्र में वनस्पतियों की अभिवृद्धि के लिये सूर्य किरणों की उपादेयता स्वीकार की गयी है। कृषि विज्ञान के अनुसार मेघ निर्माण के लिये सूर्य ज्योति अनिवार्य है। आरोग्य कामना, निर्धनता निवारण एवं संतति प्राप्ति आदि की दृष्टि से सूर्य उपासना, सूर्य पूजा एवं सूर्य त्राटक परम हितकारी है। आरोग्य की कामना करने वाले समस्त मनुष्यों को सूर्य की प्रार्थना करनी चाहिये । तंत्र साहित्य में, आगम शास्त्र में सूर्य विज्ञान की बहुत महिमा है। कविराज गोपीनाथ जी सूर्य विज्ञान के ज्ञाता भी थे और सूर्य साधना, सूर्य त्राटक के सिद्ध भी थे। कई बार उन्होंने निर्जीव पक्षियों को, जीवों को घायलावस्था अथवा मृत अवस्था से जीवित कर दिया था, वह भी केवल सूर्य की किरणों के प्रभाव से । यह सब लिखने का मात्र भाव यह है कि सूर्य त्राटक साधना करने वाला अपने अन्दर सूर्य की तेजस्विता प्राप्त कर लेता है और सूर्य के समान शक्तिशाली एवं ईश्वरीय गुणों से परिपूर्ण हो जाता है। उसका मानसिक विकास सर्वप्रथम हो जाता है। मानसिक विकास से मानसिक एकाग्रता आ जाती है और मानसिक एकाग्रता से त्राटक साधना सफलतापूर्वक सिद्धि मार्ग पर चलती जाती है। साधक को सिद्धि प्राप्त करने में अधिक कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता। फिर भी प्रत्येक स्तर पर उसे अपने गुरु अथवा सिद्ध त्राटक साधक से परामर्श अवश्य लेते रहना चाहिये । सूर्य त्राटक साधना की सिद्धि पाकर साधक अहं ब्रह्मास्मि की श्रेणी में पहुंच जाता है। फिर भी यदि वह सिद्धि तक नहीं पहुंच पाता अथवा प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ स्तर पर ही रह जाता है, तो भी उसे इतनी उपलब्धियां मिल जाती हैं कि वह सुपरमैन, महामानव की श्रेणी को प्राप्त कर लेता है।

मैंने उपरोक्त विवरण में कहा कि सर्वप्रथम उसे मानसिक विकास एवं मानसिक एकाग्रता प्राप्त हो जाती है। उसके बाद उसे दृष्टि शक्ति प्राप्त हो जाती है। दृष्टि शक्ति से सम्मोहन शक्ति प्राप्त हो जाती है। सम्मोहन शक्ति से वह मेस्मरिज्म तथा हिप्नोटिज्म के क्षेत्र को चुन सकता है और समाज में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सकता है, किन्तु आत्मिक विकास एवं आध्यात्मिक चेतना बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि त्राटक साधना के माध्यम से जो कार्य करें, उसमें व्यापारिक दृष्टिकोण कदापि न हो । यदि रोगियों का रोगोपचार करते हैं अथवा मनोचिकित्सा करते हैं तो परोपकार की भावना से करें। यदि कोई साधक नियमित अभ्यास करना चाहता है, तो उसे एक निश्चित शुल्क अर्थात् फीस निर्धारित करने का अधिकार है। फीस के अतिरिक्त और अधिक धन प्राप्ति की इच्छा नहीं करनी चाहिये । व्यक्ति को आर्थिक विकास करने का अधिकार है किन्तु लूटने का अधिकार नहीं है । यदि कोई व्यक्ति साधना के प्रतिफल को व्यापार बनाता है तो उसे निश्चित जान लेना चाहिये कि उसकी त्राटक साधना धीरे-धीरे असफलता की ओर चली जायेगी। पहले एवं दूसरे स्तर तक ही सावधान रहने की आवश्यकता होती है। दूसरा स्तर पार करते ही साधना में प्रवृत्त होने वाले साधक को त्राटक शक्ति स्वयं खींचकर आगे के सौपानों पर ले जायेगी। अतः विभिन्न अवरोध इन्हीं दोनों स्तरों में आते रहेंगे और साधक को इन अवरोधों को, कंटकाकीर्ण मार्ग को बड़े धैर्य, साहस एवं उत्साह से पार करना होगा। सूर्य त्राटक साधना करने पर साधक के तन-मन में अग्नि तत्व की प्रचुरता हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप साधक को क्रोध बहुत आता है। अग्नि तत्व बढ़ने से शरीर की चर्बी अर्थात्व सा गलने लगती है | आंखों में जलन, सिर-माथे पर गर्मी से पसीना आता है, फिर भी साधक की आंखों में, दृष्टि में ज्वलनशील ज्योति आ जाती है। साधक जिसे टकटकी लगाकर गुस्से से देख लेता है, वह डर से नज़रें चुरा लेता है और भयभीत हो जाता है।

ऐसा साधक यदि हिंसक शेर या पशु से नज़रें मिला दे तो वह डरकर भाग जायेगा। यदि देर तक किमी सूखे पने के ढेर या धुनी हुई रूई को क्रोध भरी आंखों से देख लेता है तो उसमें आग लग सकती है। इसीलिये त्राटक साधक को अपने क्रोध पर नियंत्रण रखने एवं संयम करने के लिये बार-बार कहा जाता है। प्रायः परिवार में मनुष्य क्रोध करता है, उसके क्रोध का भाजन बीबी, बच्चे या छोटे भाई-बहिन होते हैं। यदि त्राटक साधक इन पर क्रोध करेगा तो उसे बहुत बड़ी हानि हो सकती है। साधक को पानी, शरबत, ज्यूस, फल और सलाद का सेवन अधिक से अधिक करना चाहिये, ताकि वह शरीर में बढ़े अग्नि तत्व को संतुलित कर सके। दूसरे स्तर तक का त्राटक माधक बहुमुखी विकास का व्यक्ति बन जाता है। वह जो चाहं, कर सकता है, किन्तु साधक को चाहिये कि वह एक साधारण व्यक्ति बना रहे और माधना करता रहे । उसकी समस्त सांमारिक इच्छायें तो पूरी हो ही रही हैं, फिर वह अपनीअंतिम इच्छा पूरी करने का प्रयाम क्यों न करे ? तात्पर्य यह कि उसे आत्म साक्षात्कार करना चाहिये, फिर आत्मा को परमात्मा के तुल्य बनाकर आत्मा का विलय परमात्मा में करके मोक्ष एवं निर्वाण प्राप्त करना चाहिये ।


नोट:-  अगर आपको हमारे द्वारा बताई गई जानकारी  Surya Tratak Sadhna Kaise Kare? सूर्य त्राटक साधना कैसे करे ?  पसंद आये तो Like करे और Share करने अपने Freinds, Relative को ताकी सबको इसका लाभ मिल सके , ये जानकारी Tratak Sadhna Siddhi के किताब से लिया गया है ,जिसके लेखक रमेश चंद्र श्रीवास्तव जी है , इस आर्टिकल मे बताई गई साधना को गुरू के सानिध्य में करे । जिससे आपकी साधना में कोई विघ्न नहीं आयेगा।और आपके गुरू आपके शरीर की रक्षा भी करेंगे। 


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